अली हसन |
हाथी — एक ऐसा जीव जो भारतीय जनमानस में लंबे समय से शक्ति, स्थिरता और गरिमा का प्रतीक रहा है। धार्मिक प्रतीकों से लेकर राजनीतिक मंचों तक, हाथी ने सदैव भारी प्रभाव डाला है। लेकिन जब इस विशालकाय जानवर को किसी राजनीतिक दल ने अपना प्रतीक बनाया तो उसकी प्राकृतिक विशेषताएँ और कमज़ोरियाँ दोनों ही उस दल की रणनीति और राजनीति का भी प्रतिबिंब बनती चली गयी।
यही हाथी निशान जिसको बहुत सोच समझ कर मान्यवर कांशीराम ने अपनी राजनीतिक दल का चुनाव चिन्ह बनाया उसके साथ ही अपने दल का नाम रखा बहुजन समाज पार्टी (BSP) — जिसका अर्थ होता है एक ऐसा दल जो एक बहुसंख्यक समाज का प्रतिनिधित्व करता है जिसके नाम से ही ज़ाहिर होता था की एक दिन ये पार्टी कुछ बड़ा करेगी लेकिन किसको मालूम था कि ये हाथी अपने गठन के 10 साल के अंदर ही अपना ख़ुद का मुख्यमंत्री तक सफर तय कर लेगा और एक समय में सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्री के रूप में उभरेगा लेकिन आज वही हाथी जिसको देख कद्दावर नेता तक समर्पण कर दिया करते थे आज अपनी ही धीमी चाल, चुप्पी और अकेलेपन का बोझ ढोता दिख रहा है।
हाथी सदियों से भारतीय संस्कृति में राजसत्ता, गरिमा और धैर्य का प्रतीक रहा है। यह विशाल जानवर जब चलता है, तो धरती थर्राती है — लेकिन उसकी चाल गंभीर, स्थिर और धीमी होती है। वह लड़ता नहीं, पर जब लड़ता है तो निर्णायक होता है।
मान्यवर कांशीराम एवं बहन कुमारी मायावती ने इस राजनीतिक दल को अपनी कोशिशों और आक्रामक राजनीति से दलित, वंचित और मुस्लिम वर्गों को बहुजन समाज पार्टी से जोड़ा और एक सशक्त और स्थायी दल जिसका चुनाव चिन्ह हाथी रखा जिसका उद्देश्य था कि चाहे दल धीरे चले, पर गिरे नहीं।
बहुजन आंदोलन: क्या हाथी पीछे छूट रहा है?
कभी कांशीराम और मायावती ने जिस हाथी को दलित आंदोलन का प्रतीक बनाया, आज वही प्रतीक समय के साथ कदम न मिलाने की कहानी कह रहा है।
जहाँ एक समय हाथी ने मुस्लिम-दलित (DM) गठजोड़ से सरकार बनाई, वहीं आज वह न मुसलमानों से संवाद कर पा रहा है, न पिछड़ों को अपने पाले में ला पा रहा है। उत्तर प्रदेश के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में जब नए दल — जैसे आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) — मुस्लिम समाज को सीधा अपने पाले में लेने कि कोशिश कर रहा है, BSP अब भी पुराने पाठ दोहराने में लगी है।
कमज़ोरियाँ जो प्रतीक से नीति में उतर आईं
समस्या तब शुरू हुई जब हाथी के रूपक गुण BSP की राजनीतिक रणनीति में भी उतरने लगे।
आज यह सवाल है कि क्या हाथी की तरह BSP भी धीमी, प्रतिक्रियाहीन और अकेली होती जा रही है?
धीमी गति:
BSP की चुनावी रणनीति वर्षों से पुराने नारों, जातीय गणनाओं और गैर-लचीले संगठनात्मक ढांचे पर टिकी हुई है। जब देश में डिजिटल प्रचार, सोशल मीडिया और तेज़ी से बदलते मुद्दों की राजनीति तेज़ हो रही है, BSP अब भी अपने धीमे, मौन अभियान पर अडिग है।
अकेलापन:
हाथी अकेला भी चलता है, और BSP ने भी बार-बार गठबंधन से दूरी बनाई है। 2022 और 2024 के चुनावों में बिना किसी प्रमुख सहयोगी के मैदान में उतरना BSP की एकाकी रणनीति को दिखाता है — जो बार-बार हार में तब्दील हो रही है।
संवादहीनता:
हाथी की मज़बूती जब तक थी जब तक उसने मुस्लिम समाज के हर वर्ग से संवाद करने के लिए समाज से कई चेहरे दिए हुए थे लेकिन एक समय वो भी आया जब पार्टी में मुस्लिम वोट की भागीदारी सिर्फ 5 % रह गयी और 95 प्रतिशत वोट समाजवादी को शिफ्ट हो गया। पार्टी की जनसभाएँ अब कम हो गई हैं, बयान सीमित और संवाद बंद। जब राजनीति जनसंपर्क और खुली बहसों की माँग कर रही है उस समय BSP का यह मौन उसे हाशिए पर ले जा रहा है।
लचीलापन नहीं:
CSDS और लोकनीति के सर्वे बताते हैं कि बड़ी संख्या में दलित युवा अब BSP की बजाय कांग्रेस और कुछ क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी की ओर झुक रहे हैं।
गठबंधन की विफल रणनीति:
जहाँ बाकी पार्टियाँ बहु-दलीय राजनीति में गठबंधन को अपनाने लगी हैं, BSP अब भी एकला चलो की नीति पर अड़ी है — जिसने उसे गहरी राजनीतिक हानि पहुंचाई है।
यह गिरावट अचानक नहीं आई — यह वर्षों की रणनीतिक जड़ता, संवादहीन नेतृत्व और BSP के केंद्रीकृत पार्टी संचालन की परिणति है, जिसने न केवल कैडर को, बल्कि सहयोगियों को भी दूर कर दिया।

नई आवाज़: आज़ाद समाज पार्टी का उभार
जिस समय BSP की पकड़ ढीली हो रही है, उसी समय आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) — जिसे नेतृत्व दे रहे हैं एडवोकेट चंद्रशेखर आज़ाद — नए दलित-मुस्लिम मतदाताओं के बीच गहराई से जमीनी समर्थन हासिल कर रही है। क्यूंकि अधिकाँश मुस्लिम समाज ने 2022 और 2024 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को वोट किया लेकिन अखिलेश यादव की बेरुख़ी ने मुस्लिम समाज ने ख़ुद को ठगा हुआ पाया जिसको आज़ाद समाज पार्टी समझ रही है और उस पर कार्य भी शुरू कर दिया। उसी के तहत उनके दल ने मुस्लिम समाज से जुड़े नए चेहरे लाकर 12 जुलाई को लखनऊ के अटल बिहारी वाजपेयी साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में एक ऐतिहासिक कार्यक्रम “मुस्लिम संवाद: मुद्दे और समाधान” का आयोजन किया। यह केवल चुनावी जोड़-तोड़ नहीं था, बल्कि मुस्लिम समाज की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित एक गम्भीर प्रयास था —
जो BSP के एजेंडे में अब लगभग ग़ायब है।
यह कार्यक्रम क्यों था खास?
यह कार्यक्रम क्यों था खास?
- विविध भागीदारी:
जहाँ एक तरफ चंद्रशेखर मुस्लिम चेहरों को स्टेज पर जगह दे रहा है वही बहुजन समाज पार्टी आज भी अपने पुराने चेहरों को ही बागडोर थमा रखी है जो ख़ुद भी पार्टी की कार्यशैली में बदलाव नहीं चाहते
यह बयान केवल अल्पसंख्यक अधिकारों की नहीं, बल्कि संविधानिक न्याय की लड़ाई को सामने लाता है — जो BSP की अस्पष्ट और मौन नीतियों के विपरीत है।
BSP के लिए खतरे की घंटी क्यों है ASP?
बहुजन एकता का नया विज़न:
चंद्रशेखर आज़ाद की रणनीति बिल्कुल स्पष्ट है — वे कांशीराम की बहुजन एकता को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस बार मुस्लिम समाज को अग्रिम पंक्ति में रखकर। उन्हें भली-भांति ज्ञात है कि दलितों, विशेषकर जाटव समुदाय की निष्ठा अब भी पूरी तरह बहन मायावती के साथ है, और वे फिलहाल उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में आज़ाद मुस्लिम नेतृत्व का झंडा उठाकर न केवल एक नया सामाजिक गठजोड़ तैयार कर रहे हैं, बल्कि मायावती से बड़ा राजनीतिक कद हासिल करने की दिशा में भी कदम बढ़ा रहे हैं। यह एक सोची-समझी, चतुर और संभावित रूप से कारगर रणनीति है — जिसे बहनजी अभी तक भांप नहीं सकी हैं, और अगर उन्होंने समय रहते मुस्लिम समाज से कोई नया सशक्त चेहरा नहीं उभारा, तो 2025 के बाद उनके लिए यह बहुत देर भी हो सकती है।
ज़मीनी रिपोर्ट्स का इशारा:
अंबेडकरनगर, सहारनपुर और पूर्वांचल के इलाकों से रिपोर्ट्स हैं कि BSP के स्थानीय कार्यकर्ता ASP के युवा नेतृत्व से प्रभावित होकर जुड़ रहे हैं।
डिजिटल बढ़त:
BSP जहाँ सोशल मीडिया और युवाओं तक पहुंच में पिछड़ रही है, ASP ने कॉलेज और युवाओं को जोड़ना शुरू कर दिया है।
मुद्दों पर आधारित राजनीति:
ASP NEET में विफलता, पुलिस उत्पीड़न, ग्रामीण बेरोज़गारी, और नफ़रत के बढ़ते अपराधों जैसे वास्तविक मुद्दों को उठाता है — जबकि BSP पुराने नारों में अटका हुआ है।
गठबंधन के लिए खुला रवैया:
BSP की अनुमान से परे गठबंधनों की असंगति की जगह ASP धर्मनिरपेक्ष मोर्चों के लिए तैयार है — जो आज के दौर की राजनीति में ज़रूरी हो गया है।
BSP की चुप्पी: आत्मघाती मौन?
जब नई बहुजन राजनीति उभर रही है, BSP का नेतृत्व ज़मीनी गतिविधियों से ग़ायब, संगठनात्मक रूप से केन्द्रित, और मीडिया से दूर है।
पूर्व BSP नेताओं का कहना है कि ज़मीनी बैठकें अब केवल रिवाज बन गई हैं, और विचारधारा से जुड़े प्रशिक्षण समाप्त हो चुके हैं। इसके उलट, ASP की सड़क पर मौजूदगी, गिरफ़्तारी, और जनसंवाद ने चंद्रशेखर को अंबेडकरवादी नेतृत्व का नया प्रतीक बना दिया है।

क्या फिर उठेगा हाथी?
अगर बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने शीघ्र ही कोई ठोस रणनीतिक पुनर्जागरण योजना नहीं अपनाई — जिसमें सार्थक गठबंधन-नीति, युवाओं से जीवंत संवाद और नेतृत्व की सक्रिय भूमिका शामिल हो — तो संभव है कि वह उन्हीं आंदोलनों की परिधि से बाहर हो जाए, जिनकी वह कभी जननी थी।
2025 में असली सवाल यह नहीं होगा कि BSP कितनी मज़बूत है, बल्कि यह होगा कि — ‘क्या नया अंबेडकरवादी आंदोलन अब हाथी के बिना आगे बढ़ेगा?’
यह समय बहुजन समाज के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए गहन आत्मचिंतन का है — क्या हमारा लक्ष्य सिर्फ एक ऐसा राजनीतिक दल बने रहना है जो राष्ट्रीय स्तर पर 3 से 5 प्रतिशत वोट ही हासिल करता है, या फिर अब हमें सत्ता-संरचना में निर्णायक भूमिका निभाने वाली सरकार भी बनानी है?
एक लखनऊवासी होने के नाते मेरा यह मानना है कि अगर हाथी एक बार फिर उठ खड़ा हो, तो कम से कम लखनऊ वालों के लिए यह एक सुखद संकेत होगा, क्योंकि बहनजी के शासनकाल में जिस तरह क़ानून व्यवस्था के साथ-साथ शहर को जो गरिमा, पहचान और बुनियादी विकास मिला — जैसे हज़रतगंज का सौंदर्यीकरण, डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मारक, स्मृति उपवन, मान्यवर कांशीराम स्मृति उपवन जैसे भव्य स्मारकों का निर्माण, सड़कों और फ्लाईओवरों का विस्तार, गोमती नदी के तट का सौंदर्यीकरण और कांशीराम आवास योजना जैसी जनकल्याणकारी योजनाएँ — वह वाक़ई क़ाबिल-ए-तारीफ़ और यादगार हैं।

अली हसन
अली हसन लखनऊ स्थित एक अनुभवी और समर्पित पत्रकार हैं, जो वर्षों से जमीनी मुद्दों, जन आंदोलनों और हाशिए पर खड़े तबकों की आवाज़ को मुख्यधारा में लाने का काम कर रहे हैं। वे ‘हिंदुस्तान नामा’ के संस्थापक संपादक हैं।















