चुनाव विशेष
अल्पसंख्यक सांसदों नेताओं की अनदेखी, टिकट में दलित-ओबीसी की उपेक्षा
रितेश सिन्हा
बिहार चुनाव के लिए नामांकन से पूर्व देर रात कांग्रेस ने 48 उम्मीदवारों की सूची जारी की। ओबीसी और दलित की राजनीति करने वाली कांग्रेस की सूची से बड़े और स्थापित चेहरे गायब हैं। 4 वर्तमान विधायकों की टिकट कटा है। घोषित 48 उम्मीदवारों में 8 भूमिहार, 6 राजपूत, 6 ब्राह्मण, 4 मुस्लिम, 9 अनुसूचित जाति, 2 ओबीसी और 1 अनुसूचित जनजाति से हैं। कायस्थ समुदाय को अनदेखा किया है। कभी कायस्थों की अच्छी भागीदारी होती थी, इस बार ओबीसी पर कांग्रेस ने दांव फेंकने के नाम पर खानापूर्ति की है। खगड़िया से छत्रपति यादव, पूर्व विधायक दल के नेता विजय शंकर दुबे, जमालपुर से अजय और अररिया से आबिदुर रहमान का टिकट कटा। अपनी पत्नी से राहुल के करीबी होने का फायदा उठाते हुए चंदन यादव ने राजनीति में बड़ा कद हासिल किया। चंदन पिछला चुनाव हारे थे पर पत्नी के बूते कार्यकर्ता से नेता, विधायक बने छत्रपति यादव का टिकट कटवा कर खगड़िया से ताल ठोक रहे हैं।
दलित और ओबीसी की सियासत कर रही कांग्रेस ने पहले दलित मुख्यमंत्री भोला पासवान शास़्त्री के परिवार की परंपरागत सीट बनमनखी से उनके वंशज अर्जुन पासवान के दावे को सिरे से खारिज कर दिया। कांग्रेस की कहलगांव सीट पर भी उसका दावा नहीं है। टिकट बंटवारे के बाद से पटना के सदाकत आश्रम, एयरपोर्ट से लेकर दिल्ली तक बवाल मचा हुआ है। सूची से बिहार कांग्रेस के बाबा बने हुए कन्हैया कुमार गायब हैं। हालांकि दिल्ली में बिहारी द्वारा नकारने के बाद कन्हैया बिहार को अपना कर्मभूमि बनाने उतरे थे। ऐसी चर्चाएं हैं कि पदयात्रा के दौरान जनता से करोड़ों का चंदा वसूल कर कन्हैया फिलहाल प्रदेश से लापता हैं। उनके समर्थक बेगूसराय से चुनाव लड़ने की बात कहते रहे, लेकिन वहां दिग्गज बाहुबली बोगो सिंह और कामदेव सिंह के विधायक पुत्र, वामपंथी नेताओं के डर से कन्हैया पीछे हट गए। कन्हैया खबरिया चैनलों और यू-ट्बर पर गड़गड़ाने के अलावा कहीं अपना प्रभावक्षेत्र नहीं बना सके। कांग्रेस ने जेएनयू आंदोलन के बाद उन्हें सर-आंखों पर बिठाते हुए सीडब्लूसी में बड़ी जिम्मेदारी देते हुए एनएसयूआई का इंचार्ज बनाया। किसी भी प्रदेश में संगठन को खड़ा करने में कन्हैया नाकाम रहे हैं। जेएनयू की राजनीति से रातोंरात नेता बने कन्हैया अब जाने से घबराते हैं। तेलंगाना और दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव में हार के पीछे कन्हैया की हठधर्मिता बतायी जाती है। एनएसयूआई अब कागजों में सिर्फ रायसीना रोड तक सीमित है। राजनीति में कन्हैया जोकर ही साबित हुए हैं।
स्क्रीनिंग कमिटी में शामिल अजय माकन, इमरान प्रतापगढ़ी, प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम पर टिकट बेचने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। जिस फार्मूले से टिकट बंटे हैं, सचमुच हैरान करने वाला है। राहुल गांधी जिन हाथों में जिम्मेदारी सौंपते हैं, वे अपना कारोबार कर बैठते हैं। माकन के संदर्भ में हमने कई बार अपने लेख के माध्यम से कांग्रेस आलाकमान को आगाह भी किया था। फिर भी अजय माकन, प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष और सचिवों के माध्यम से बिहार में बड़ा खेल कर चुके हैं। नतीजे भी वैसे ही आएंगे। माकन स्क्रीनिंग कमिटी के जरिए छत्तीसगढ़, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली में जहां कांग्रेस की सरकार बन सकती थी, वहां पार्टी को समेट चुके हैं। माकन को हर बार मौका मिल जाता है और गैंग बनाकर लूट-पाट कर टिकट बांट देते हैं।
माकन और अल्लावरू की अगुवाई में अन्य प्रदेशों की तर्ज पर बिहार में भी ’’दो और लो’’ के फार्मूले के साथ सिंबल बांट चुका है। 30000 से अधिक वोटों से हारे रीगा के पूर्व विधायक झारखंडी अमित कुमार टुन्ना को कांग्रेस का सिंबल मिल चुका है। ऐसी चर्चा है कि 114 वोटों से पिछला चुनाव हारने वाले गजानंद शाही के पास भी इस गैंग ने फोन कर पैसों की मांग की थी। पैसे देने से इंकार के बाद टिकट कटा। चर्चाओं पर गौर करें तो बरबीघा में दो और लो के फार्मूले पर बाहुबली अनंत सिंह के बाहुबली मामा त्रिशुलधारी सिंह 3 करोड़ की मोटी रकम के साथ सिंबल ले चुके हैं। इस प्रकरण पर सफाई देते हुए प्रदेश अध्यक्ष के करीबी सूत्रों ने बताया कि सांसद तारिक अनवर के करीबी होने की सजा के तौर गजानंद शाही उर्फ मुन्ना, अब्दुल बारी, मधुरेंद्र कुमार सिंह, सास्वत, अजय सिंह और शेख कामरान जैसे पुराने कार्यकर्ताओं को टिकट से वंचित किया गया। ये सभी बड़ी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों से ताल्लुक रखते हैं।
पूर्व विधायक गजानंद शाही उर्फ मुन्ना स्वर्गीय इंदिरा गांधी के बेलछी जाने के क्रम में एनएसयूआई अध्यक्ष श्याम सुंदर सिंह धीरज के कहने पर अपने पालतू हाथी पर उनको सवार करवा कर नदी पार ले गए थे। जेपी आंदोलन के बाद बिहार में कांग्रेस की वापसी में बेलछी यात्रा महत्वपूर्ण स्थान है। चर्चा की बात करें तो रोसरा से बीके रवि, बेगूसराय से पूर्व विधायक अमिता भूषण को मोल-भाव के साथ टिकट मिल चुका है। विक्रम विधानसभा में 5 करोड़ रूपए का खेल पहले से ही सियासी बाजार चर्चा से गर्म है। यहां से अनिल कुमार भाजपा सहित कई दलां से होते हुए कांग्रेस में शामिल हुए और रातों रात सिंबल ले बैठे। मुजफ्फरपुर से अच्छी रकम खींची गई। बकायदा मुजफ्फरपुर में बैठकर स्क्रीनिंग कमिटी में अल्पसंख्यक के चहचहाते चेहरे ने बकायदा वहां खुली बोली लगवाई थी, ऐसी चर्चाएं जिले में गर्म है।
बछवाड़ा में कई बार के सांसद, विधायक रहे रामदेव राय के पुत्र का टिकट काटा गया था। प्रभारी अल्लावरू ने बतौर यूथ कांग्रेस प्रभारी के रहते गरीब दास को राजनीतिक तौर पर जिंदा रखने के लिए बिहार यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया था। आज फिर से उसी दो और लो के फार्मूले के साथ शिव प्रकाश उर्फ गरीब दास भी कांग्रेसी सिंबल लेने में कामयाब हो गए। जिलाध्यक्षों को टिकट बांटने के क्रम में अमरेश कुमार लखीसराय से और फुलपरास से सुबोध मंडल सहित 8 जिलाध्यक्षों को सिंबल मिला है। गयाजी, टेकारी पर बोली लगी है। जो कीमत चुकाएगा, वो टिकट लाएगा।
दूसरी सूची आनी बाकी है। मजे की बात है कि विधायक दल के नेता के सरकारी आवास पर चल रहे वार रूम टिकट बंटवारे के बाद चुनावी वार शुरू होने से पहले बंद हो चुका है। होटल मौर्या के मालिक को वायदा कर टिकट न देने पर वहां के प्रबंधन ने होटल से कांग्रेसियों को खदेड़ दिया। अब आशियाना होटल चाणक्या है। पकड़ो और मारो के नारे के साथ एयरपोर्ट पर हुए कांड के बाद प्रभारी की मदद के लिए बाउंसरों के अलावा अशोक गहलोत और भूपेश बघेल पटना पहुंच गए। ये दोनों दिग्गज बिहार में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बढ़ते विद्रोह को कैसे दबाते हैं। जिस खेल के साथ टिकट बांटे गए हैं, उससे पिछले बार दहाई के आंकड़े पर खड़ी कांग्रेस अब दहाई के अंक पकड़ने के लिए कड़ा संघर्ष करेगी।

रितेश सिन्हा















