अली हसन |
बिहार का सियासी मंज़र 17 अगस्त 2025 को तब बदलता नज़र आया, जब “वोटर अधिकार यात्रा” की शुरुआत एक विशाल रैली के साथ हुई। इस रैली ने विपक्षी गठबंधन की ताक़त का इज़हार तो किया, मगर ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही बयान कर रही थी। नारों, तालियों और भीड़ के जोश का केन्द्रबिन्दु साफ़ था—राहुल गांधी।
सड़कों पर “राहुल गांधी ज़िंदाबाद” और “राहुल तुम आगे बढ़ो” के नारे गूंजते रहे। हज़ारों लोग इकट्ठा हुए, सिर्फ़ गठबंधन के समर्थक बनकर नहीं, बल्कि कांग्रेस नेता के प्रशंसक बनकर। राहुल गांधी, जो पिछले कुछ समय से “जन-नेता” की छवि गढ़ने में लगे हैं, बिहार की भीड़ पर जैसे जादू चला गए।
लेकिन इस जोश और लगाव के नीचे एक सियासी विडम्बना भी छुपी हुई है—इस करिश्माई भीड़ का सीधा फ़ायदा कांग्रेस को नहीं बल्कि लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को मिलता दिख रहा है।
राजद की पकड़, कांग्रेस हाशिये पर
रैली का आयोजन तो संयुक्त रूप से हुआ, मगर ज़मीनी तस्वीर ने अलग कहानी सुनाई। भीड़ जुटाने की मेहनत राजद कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं ने की, जबकि कांग्रेस के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में नज़र नहीं आए। बैनर, झंडे और जमीनी नेटवर्क पर राजद का ही दबदबा था, जिसने बिहार में उसके संगठनात्मक बल को उजागर कर दिया।
कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इस पैटर्न को दोहराया हुआ बताया—राहुल गांधी भीड़ को खींचते हैं, मगर चुनावी फ़ायदा उनका सहयोगी दल, यानी बिहार में राजद, ले जाता है। पटना की रैली में शामिल एक दुकानदार ने साफ़ कहा, “राहुल गांधी के जोश से राजद को फ़ायदा होगा, कांग्रेस को नहीं।”
वामपंथ और छोटे दलों का योगदान
इस यात्रा को और मज़बूती देने के लिए कम्युनिस्ट पार्टियाँ और छोटे क्षेत्रीय दल भी इसमें शामिल हुए। उनकी मौजूदगी ने इस आंदोलन को व्यापक विपक्षी स्वरूप दिया। सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई(एमएल) के नेता एक मंच पर दिखे, यह जताने के लिए कि बिहार में बीजेपी-जदयू गठबंधन के ख़िलाफ़ विपक्ष एकजुट है। इस रैली का मक़सद “वोटर अधिकार” और “विपक्षी एकता” दोनों को साथ-साथ मज़बूत करना था।
राहुल गांधी: रैली का असली चेहरा
संगठनात्मक तौर पर राजद भले ही भारी पड़ा हो, मगर राहुल गांधी भावनात्मक और राजनीतिक आकर्षण का केन्द्र बने रहे। उनके पहुँचते ही भीड़ ने तालियों से स्वागत किया, भाषण बार-बार नारों और तालियों से बाधित हुआ, और न्याय, रोज़गार और लोकतंत्र की हिफ़ाज़त की उनकी अपीलों पर लोग जुड़ते चले गए।
युवाओं में राहुल की स्वीकार्यता साफ़ झलक रही थी। कॉलेज के छात्र और पहली बार वोट डालने वाले युवा उनके पोस्टर और तख्तियाँ लेकर नज़र आए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति कांग्रेस के लिए मौक़ा भी है और चुनौती भी। राहुल गांधी जहाँ राष्ट्रीय विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, वहीं बिहार में कांग्रेस की संगठनात्मक कमज़ोरी का मतलब यह है कि तत्काल चुनावी फ़ायदा राजद की झोली में जाता है।
सियासी विडम्बना
यात्रा के पहले ही दिन यह विडम्बना साफ़ दिखाई दी—भीड़ का जोश और उत्साह राहुल गांधी के इर्द-गिर्द घूमता रहा, मगर वोट की राजनीति में लाभ राजद को मिलने की सम्भावना है। कांग्रेस के लिए यह कार्यक्रम एक ओर उसके नेता की लोकप्रियता की पुष्टि करता है, तो दूसरी ओर संगठनात्मक ढांचे की कमज़ोरियों की याद भी दिलाता है।
अब जब यह यात्रा बिहार के विभिन्न ज़िलों में आगे बढ़ेगी, बड़ा सवाल यही रहेगा: क्या कांग्रेस राहुल गांधी की लोकप्रियता को अपने प्रत्याशियों के वोट में तब्दील कर पाएगी, या एक बार फिर सारा फ़ायदा उसके क्षेत्रीय सहयोगी को मिल जाएगा?
फ़िलहाल, बिहार की सड़कों से एक ही पैग़ाम सुनाई देता है—भीड़ राहुल गांधी की है, मगर सियासी फ़ायदा राजद का।















