चुनाव विशेष
रितेश सिन्हा।
बिहार में अल्पसंख्यक मुस्लिम मतदाताओं के बीच मंथन जारी है। राजद-कांग्रेस के खिलाफ इन मतदाताओं ने अपने ’मन की बात’ को फिलहाल ’मन’ में रखा हुआ है। बिहार राज्य के अस्तित्व में आने के बाद देश में हुई आजादी से पहले बनी प्रांतीय सरकारों में मोहम्मद युनूस 1936-37 में प्रदेश के पहले प्रधानमंत्री बनाए गए थे। उस दौर में प्रांतीय सरकारों के प्रमुख, जिसे आज मुख्यमंत्री कहते हैं, उनको प्रधानमंत्री कहा जाता था। मोहम्मद युनूस को कांग्रेसी सरकार का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। आजाद देश में एक प्रधानमंत्री बना और सूबों के प्रमुखों को मुख्यमंत्री का दर्जा दिया गया। उस समय मुस्लिम समाज का एक तबका जो राजनीतिक रूप से जागरूक था, बंटवारे में पाकिस्तान चला गया। कौमी दंगे हुए। देश भर का मुसलमान हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद खुद को महफूज रखने के लिए राजनीतिक रूप से धीमा पड़ गया। इसका पूरे देश पर असर भी दिखा।
बिहार और यूपी से ही पाकिस्तान बनाने की मांग उठी थी और वो बंटवारे का बड़ा कारण बनी। बंटवारे के बाद हिन्दुस्तान में रहने वाले मुस्लिम समाज को कांग्रेस ने मौलाना आजाद और जवाहरलाल नेहरू के जरिए राजनीतिक रूप से पार्टी से पूरी तरह से जोड़ लिया। कांग्रेस ने मौका पाते ही अपनी सेकुलर राजनीति को बढ़ाते हुए कई अल्पसंख्यक चेहरों को देश भर में प्रदेश की सरकारों में और केंद्र सरकार में अच्छी-खासी भागीदारी दी। कांग्रेस ने देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति सहित सर्वोच्च पदों पर निर्वाचित करवाया। बिहार की बात करें तो यहां अब्दुल गफूर को सूबे की कमान सौंपी। इसके अलावा अन्य प्रदेशों में असम में अनवरा तैमूर, जम्मू-कश्मीर में मीर कासिम व गुलाम नबी आजाद, राजस्थान के पहले सीएम बरकतुल्लाह और महाराष्ट्र में अब्दुल रहमान अंतुले मुख्यमंत्री बनाए गए। कांग्रेस ने समर्थन देकर फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूता मुफ्ती को मुख्यमंत्री भी बनाया।
90 के दशक में बाबरी मस्जिद कांड के बाद देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की अहमियत बढ़ी। इन दलों ने मस्जिद बनाम मंदिर की राजनीति करते हुए कांग्रेस को अल्पसंख्यकों के बीच बदनाम करते हुए उनके वोट बटोर लिए। सपा-बसपा, नेकां, बिहार में राजद, समता पार्टी अब जदयू ने मुस्लिम तबकों के वोट हासिल किया। ये दल इसे सामाजिक न्याय की लड़ाई बनाते हुए सरकारों पर काबिज हुए। पिछले 35 से अधिक वर्षों से क्षेत्रीय दल इसी नीति के जरिए सरकार बनाते रहे। वहीं मुस्लिमों के नाम पर पान खिलाने वाले, गवैये, कवाब बनाने वाले, रसोइए जैसे लोगों को विधानसभा, विधान परिषद्, लोकसभा और राज्यसभा में भेजा। वोट बटोरने के लिए नवाजी टोपी लगाकर और खास अंगोछा ओढ़कर अपनी पैंठ बढ़ा ली।
अल्पसंख्यकों का वो तबका जो समाज का नेतृत्व करने वाला था, जो सही चेहरा हो सकता था, उसको इन दलों ने ठगा। आज भी अब्दुल बारी सिद्दिकी जैसा बेदाग और निर्विवाद अल्पसंख्यक चेहरा जिसे बहुसंख्यक भी पसंद करता है, सरकार में महज मंत्री बनकर रह गए। आज एक छोटी पार्टी राजद के लिए ’वीआईपी’ बनी हुई है। 18 फीसदी मुस्लिमों के दावे को दरकिनार करते हुए उनको उपमुख्यमंत्री का चेहरा बना दिया। बिहार के पहले चरण का मतदान का प्रचार 4 नवंबर को बंद होगा। राजद फिर से उन पुराने मुद्दों को गरमा कर अल्पसंख्यकों का वोट तो हासिल करना चाहता है, साथ ही भागीदारी के नाम केवल अपने परिवार को बढ़ाना और मुस्लिमों को अंगूठा दिखाना चाहता है। महागठबंधन की इस खेल में कांग्रेस भी शामिल है।
अल्पसंख्यकों की बड़ी-बड़ी बात करने वाली कांग्रेस उस प्रेस वार्ता से गायब हो गई जहां अल्पसंख्यकों को बड़ी भूमिका के सवाल-जवाब हो सकते थे। राजद के बाद सबसे बड़े दल के रूप में गठबंधन की भागीदार कांग्रेस उपमुख्यमंत्री की बात तो करती है, मगर अल्पसंख्यकों के नाम पर उसकी चुप्पी इसकी नियत को ही दर्शाती है। वहीं गवैये, नचकैये, भांडों की टीम अल्पसंख्यकों की टीम कांग्रेस में कयादत कर रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में सीमांचल में 5 विधायक जिताकर खलबली मचाने वाले असदुद्दीन ओवैसी के पीछे अल्पसंख्यक नौजवानों का वो तबका मजबूती से आ खड़ा हुआ है जो सूबे में इन सेकुलर दलों के द्वारा जलील होता हुआ खुद को महसूस कर रहा है। मतदान के बाद से ही उसके योगदान को सिरे से नकार देने वाले इन दलों से खासा नाराज है। ऐसा नहीं है कि अल्पसंख्यक का बड़ा तबका सेकुलर राजनीति की हिमायत करता है, अब उसे जनसुराज में आशा की किरण दिख रही है। ओवैसी के साथ न जाने वाला तबका जनसुराज की तरफ मुड़ सकता है। ऐसे में महागठबंधन और राजद का सपना अब चकनाचूर हो सकता है। ओवैसी ने उन क्षेत्रों में ठोस उम्मीदवार उतारे हैं जिनकी सेकुलर इमेज हैं जिसे बहुसंख्यक तबका भी पसंद करता है। ऐसी 32 सीटों को चिन्हित कर एआईएम के उम्मीदवार मैदान में हैं जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक है। पहले ये वोट महागठबंधन और राजद के पक्ष में एकतरफा पड़ता रहा है। अब ये एक जंग का रूप ले चुकी है।
डैमेज कंट्रोल के नाम पर बाहुबली मरहूम शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा को राजद ने सीटिंग का टिकट काटकर मैदान में उतार दिया है। इससे पहले शहाबुद्दीन के अंतिम दिनों में उनके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए राजद ने उनके परिवार से किनारा कर लिया था। अल्पसंख्यकों के बीच भाजपा को रोकने की मुहिम में अब विकल्प के तौर पर जनसुराज भी मैदान में है। जनसुराज के नेताओं ने विगत 3 वर्षों से बिहार के मतदाताओं में जिसमें अल्पसंख्यक भी शामिल हैं, स्थानीय मुद्दों के साथ वर्तमान नीतीश सरकार पर हमला बोला है, उसने एक विकल्प देने की कोशिश की है। ओवैसी के साथ जनसुराज का ये प्रयास राजद-कांग्रेस का खेल बिगाड़ने के लिए काफी है। ये अल्पसंख्यकों में सामाजिक और वैचारिक ध्रुवीकरण का केंद्र बन रहा है। राजद का घमंडी नेतृत्व अल्पसंख्यकों को उनको वाजिब हक देने को आज भी तैयार नहीं है जिसका खामियाजा उसको इस चुनाव में भुगतना पड़ेगा।

रितेश सिन्हा















