– आसिफ़ ज़माँ रिज़वी
भारत में दीवाली केवल रोशनी का त्योहार नहीं है—यह संस्कृति, शिल्पकला और साम्प्रदायिक सौहार्द का जीवंत ताना-बाना है, एक ऐसा प्रकाशमय धागा जो सदियों से इस देश की आत्मा को जोड़ता आया है। दीये की लौ केवल अंधकार को नहीं मिटाती, बल्कि उन अनगिनत कारीगरों की मेहनत को भी उजागर करती है, जिनके हाथ मिट्टी और आग से उजाला गढ़ते हैं। इन हाथों के लिए धर्म कोई दीवार नहीं—क्योंकि रोशनी सबकी होती है।
उत्तर प्रदेश इस साझे भाव का सबसे उजला उदाहरण है। प्रदेश के हर जिले में पीढ़ियों से कारीगर दीये गढ़ते हैं, मूर्तियाँ बनाते हैं, रंग भरते हैं और दीवाली के मेलों को जीवंत करते हैं। लखनऊ, अयोध्या, आज़मगढ़, मऊ, भदोही, फ़िरोज़ाबाद और मुरादाबाद जैसे नगरों में हज़ारों मुस्लिम परिवारों की आजीविका इस पर्व से जुड़ी है। यही साझेदारी, यही गंगा-जमुनी तहज़ीब, उत्तर प्रदेश की गलियों से लेकर हर घर की चौखट तक झिलमिलाती है।
साल 2017 के बाद से उत्तर प्रदेश ने इस सांस्कृतिक चेतना को नए आयाम दिए हैं। जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में दीवाली उत्सव की शुरुआत की थी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह आयोजन विश्वस्तरीय सांस्कृतिक उत्सव बन जाएगा। पिछले वर्ष (2024) सरयू तट पर 25.12 लाख दीप प्रज्वलित हुए; इस वर्ष (2025) लक्ष्य है 28 लाख दीपों का। यह भव्य दृश्य न केवल आध्यात्मिक आलोक फैलाता है, बल्कि हज़ारों स्थानीय कुम्हारों और शिल्पकारों के घरों में आर्थिक उजाला भी लाता है।
अयोध्या के आसपास के गाँवों में दीवाली पर मिट्टी के दीयों की माँग केवल एक मौसमी कारोबार नहीं—बल्कि पूरे वर्ष का सहारा है। सरकार द्वारा स्थानीय कारीगरों से दीप खरीदने का निर्णय श्रद्धा को रोज़गार से जोड़ने वाली दूरदर्शी पहल है। इन कारीगरों में बड़ी संख्या मुस्लिम परिवारों की है, जिनके पूर्वजों से यह हुनर विरासत में मिला है। यही असली तस्वीर है उत्तर प्रदेश की तरक़्क़ी और मेल-मिलाप की—एक मुस्लिम कारीगर के हाथों बना दीया जब किसी हिंदू परिवार के आँगन में जगमगाता है, तो दोनों ज़िंदगियाँ एक-दूसरे को रोशन करती हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की संयुक्त दृष्टि ने पारंपरिक शिल्पकला को नई पहचान दी है। केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना ने पूरे देश में कारीगरों को प्रशिक्षण, औज़ार, ₹15,000 की सहायता राशि और कम ब्याज पर ऋण की सुविधा दी है। इस योजना का लाभ लाखों लोगों तक पहुँचा है, जिनमें उत्तर प्रदेश अग्रणी है। मिट्टी के दीये, मूर्तिकला, चित्रकारी, धातु कला—सभी को इस योजना के दायरे में लाकर सरकार ने पारंपरिक कलाओं के संरक्षण और विकास की राह खोली है।
इसके साथ ही अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की योजना USTTAD (Upgrading Skills and Training in Traditional Arts for Development) विशेष रूप से मुस्लिम कारीगरों के कौशल विकास पर केंद्रित है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न ज़िलों में आयोजित प्रशिक्षण शिविरों ने न केवल पारंपरिक कलाओं को पुनर्जीवित किया है, बल्कि युवा कारीगरों को डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स की जानकारी देकर आधुनिक बाज़ारों से जोड़ा है।
राज्य सरकार की विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना और वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) जैसे कार्यक्रमों ने भी कारीगरों को पहचान और स्थिरता दी है। पिछले दो वर्षों में 1.43 लाख से अधिक कारीगरों को प्रशिक्षण, औज़ार और वित्तीय सहायता दी जा चुकी है। मिट्टी, लकड़ी, धातु और टेराकोटा जैसे उत्पादों को प्रोत्साहन देकर योगी सरकार ने स्थानीय रोज़गार को सशक्त किया है और भारत की कलात्मक विरासत को संरक्षित रखा है।
अयोध्या की दीवाली अब केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं रही—यह आर्थिक गतिविधि का केंद्र बन चुकी है। अनुमान है कि हर साल 10,000 से अधिक स्थानीय कारीगर इस उत्सव से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लाभान्वित होते हैं। दीयों से लेकर सजावट, वस्त्र, पुष्प, प्रकाश व्यवस्था और परिवहन तक, हर क्षेत्र में इसका सकारात्मक प्रभाव दिखता है, जिससे छोटे व्यापारियों और कारीगर परिवारों की आजीविका सुदृढ़ होती है।
प्रधानमंत्री मोदी की “वोकल फ़ॉर लोकल” और आत्मनिर्भर भारत की भावना अयोध्या में साकार होती दिखती है। जब एक मुस्लिम कुम्हार अपनी चाक पर मिट्टी को आकार देता है, जो सरयू के घाटों पर जलने वाले दीप में परिवर्तित होती है, तब वह केवल मिट्टी नहीं, भारत की आत्मा को गढ़ रहा होता है।
लखनऊ के हुसैनगंज, फ़िरोज़ाबाद के बाज़ारों, मुरादाबाद के बर्तन गलियों, और आज़मगढ़-भदोही की कारीगर बस्तियों में यही साझा संस्कृति आज भी जीवंत है। यहाँ हिंदू व्यापारी और मुस्लिम कारीगर साथ काम करते हैं—बीच में कोई मज़हबी दीवार नहीं, केवल भरोसा, हुनर और परस्पर सम्मान। यही वह भारत है जिसकी कल्पना गांधी, नेहरू और पटेल ने की थी—जहाँ आस्था और आजीविका एक-दूसरे के पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं।
सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि कारीगरों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिले। ODOP उत्पाद अब ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्मों पर बेचे जा रहे हैं; हुनर हाट और मिशन शक्ति बाज़ार जैसे आयोजनों ने कारीगरों को न केवल प्रदर्शन मंच दिया है, बल्कि बिक्री के अवसर भी। इन मेलों में मुस्लिम कारीगरों की बढ़ती भागीदारी समावेशी विकास की जीवंत मिसाल है।
जब प्रधानमंत्री मोदी अयोध्या में दीप जलाते हैं और मुख्यमंत्री योगी सरयू घाटों पर लाखों दीपों की चमक के बीच खड़े होते हैं, तो यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता—यह भारत की साझा विरासत का उत्सव होता है। यह वह क्षण है जब नीति, परंपरा और रोज़गार एक साथ उजाला फैलाते हैं—एक नए उत्तर प्रदेश की दिशा में, जहाँ आस्था और अर्थव्यवस्था साथ-साथ दमकती हैं।
फिर भी आगे की राह में सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। मुस्लिम कारीगरों के बीच पारदर्शिता, आँकड़ों की उपलब्धता और योजनाओं की जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। साझा प्रशिक्षण केंद्रों का विस्तार, डिजिटल कौशल विकास और ई-मार्केटिंग के अवसर इस पारंपरिक कला को वैश्विक पहचान दिला सकते हैं।
जब दुनिया विभाजन की ओर झुक रही है, तब उत्तर प्रदेश एक उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत करता है—कि आस्था और आजीविका साथ रह सकती हैं। जब एक मुस्लिम कारीगर मिट्टी को आकार देता है और एक हिंदू परिवार अपने आँगन में वही दीया जलाता है, तो दोनों एक-दूसरे के अस्तित्व को रोशन करते हैं। यही भारत की सच्ची ताक़त है—मोदी-योगी काल का वह उत्तर प्रदेश जहाँ विकास, धर्म और रोज़गार साझा प्रकाश में नहाए हुए हैं।
आज की अयोध्या की दीवाली केवल भगवान राम की विजय का प्रतीक नहीं—यह हर मज़हब, हर समुदाय और हर कारीगर की सामूहिक जीत है। इन दीयों की चमक में मुस्लिम शिल्पकारों का पसीना, हुनर और मेहनत झिलमिलाती है, जो भारत के सामाजिक ताने-बाने को और मजबूत करती है।
जब हम इस दीवाली अपने घरों में दीये जलाएँ, तो याद रखें—यह केवल पूजा के प्रतीक नहीं, बल्कि उन कारीगरों के हाथों की मिट्टी को श्रद्धांजलि हैं, जिनसे यह रोशनी जन्म लेती है। यही भारत है—जहाँ मिट्टी, मेहनत और एकता मिलकर ऐसा उजाला रचते हैं, जो न धर्म से बँधा है, न सरहद से। यही है गंगा-जमुनी दीवाली—नए भारत का असली प्रतीक।

आसिफ़ ज़मां रिज़वी















