अली हसन | हिंदुस्तान नामा
हिंदी-उर्दू साहित्य की एक विशिष्ट विधा “मर्सिया” न केवल शोक की अभिव्यक्ति है, बल्कि वह सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक चेतना का जीवंत दस्तावेज भी है। विशेष रूप से अवध की जमीन पर मर्सिया ने केवल धार्मिक भावनाओं को ही स्वर नहीं दिया, बल्कि उसे एक साहित्यिक ऊँचाई भी प्रदान की। इस परंपरा में मीर अनीस, मिर्जा दबीर जैसे महान शायरों के बाद कई साहित्यकारों ने इस विधा को अपनी लेखनी से समृद्ध किया।
मर्सिया: एक ऐतिहासिक झरोखा
मर्सिया मूलतः अरबी शब्द ‘रस’ से निकला है, जिसका अर्थ होता है—शोक या विलाप। भारत में मर्सिया का विकास विशेष रूप से लखनऊ में नवाबी दौर (18वीं–19वीं शताब्दी) में हुआ। यह परंपरा हज़रत इमाम हुसैन और करबला के शहीदों की याद में पढ़े जाने वाले शोक गाथा के रूप में शुरू हुई थी। धीरे-धीरे यह केवल मजलिसों तक सीमित न रहकर, साहित्यिक रूप से भी समृद्ध होने लगी।
मीर अनीस और मिर्जा दबीर ने मर्सिए को सात बंधों (मुकद्दमा, वाक़िआ, रज़्म आदि) में गढ़ कर इसे काव्यात्मक उत्कृष्टता दी। उनके मर्सिए केवल शोकगीत नहीं, बल्कि करबला की घटना का जीवंत चित्रण हैं।
लखनऊ में मर्सिया परंपरा और हिंदू लेखकों की विशिष्ट भागीदारी
जब उर्दू भाषा और साहित्य का केंद्र दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर स्थानांतरित हुआ और अवध के नवाबों के संरक्षण में लखनऊ में अज़ादारी की परंपरा फली-फूली, तब मर्सिया लेखन का नया युग प्रारंभ हुआ। इस दौर में केवल मुस्लिम साहित्यकार ही नहीं, बल्कि अनेक हिंदू कवि और लेखक भी इस सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बने और उन्होंने मर्सिया लेखन में भी विशिष्ट योगदान दिया।
इन लेखकों में सबसे प्रसिद्ध नाम था मुंशी चन्नू लाल लखनवी का। उन्होंने ग़ज़लें ‘तरब’ तखल्लुस से और मर्सिये ‘दिलगीर’ नाम से लिखे। उनके साहित्यिक जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्होंने स्वयं को केवल मर्सिया लेखन तक सीमित कर लिया और इस विधा में अद्वितीय पहचान बनाई। उनके मर्सिये करबला की त्रासदी को अत्यंत भावपूर्ण एवं कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

देवी रूप कुमारी
महिलाओं की भूमिका और देवी रूप कुमारी
हिंदू मर्सिया लेखकों में एक उल्लेखनीय नाम रूप कंवर कुमारी का भी है। वे काश्मीरी पंडित परिवार से थीं और आगरा में निवास करती थीं। रूप कंवर सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग लेने से कतराती थीं और केवल उन्हीं मर्सिया लेखकों से संवाद करती थीं जिन्हें वे साहित्यिक रूप से योग्य मानती थीं। उन्होंने 1920 और 1930 के दशक में मर्सिये लिखे, जिनमें हिंदू भक्ति परंपरा और फारसी-उर्दू शैली का एक सुंदर सम्मिश्रण देखने को मिलता है।
उन्होंने एक ऐसी अभिव्यक्ति शैली विकसित की जिसमें ‘भक्ति भावनाओं’ की शब्दावली और मर्सिया की पारंपरिक फारसी-प्रेरित शैली एक साथ गूंथी गई। इसी सम्मिश्रण ने उनके मर्सिया को एक नया स्वाद और विशिष्टता प्रदान की। वे हज़रत अली को ‘ऋषि’, ‘भक्त’ या ‘महाराज’ कह कर संबोधित करती थीं और लिखा:
“नजफ़ हमारे लिए हरिद्वार और काशी है।”
उनकी लेखनी की झलक उनके इस दोहे में देखी जा सकती है, जो भावनात्मकता और भक्ति से परिपूर्ण है:
अली के चरणों में है सबकी शरण,
अली हैं दोनों आत्माओं के प्रिय।
अली की हक़ीक़त को कोई नहीं जानता,
सिवाय पैग़ंबर और परमात्मा के।
रूप कंवर कुमारी ने जिस सांस्कृतिक समन्वय और आस्था के साथ मर्सिया लिखे, वह उन्हें अपने समकालीन लेखकों के बीच विशिष्ट स्थान प्रदान करता है। उनके माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि मर्सिया केवल किसी एक मज़हब की भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक चेतना का सशक्त माध्यम भी है।
इतिहास गवाह है कि मर्सिए की दुनिया लंबे समय तक पुरुष लेखकों के अधीन रही। परंतु 20वीं सदी के उत्तरार्ध में देवी रूप कुमारी जैसी लेखिकाओं ने इस परंपरा में प्रवेश कर इसे एक नई दृष्टि प्रदान की। देवी रूप कुमारी न केवल हिंदी साहित्य में पारंगत थीं, बल्कि उर्दू के काव्य शास्त्र को भी उन्होंने गहराई से आत्मसात किया।
उनके मर्सिए करबला के शहीदों की त्रासदी को स्त्री-दृष्टिकोण से उजागर करते हैं—जहाँ शोक केवल वीरगाथा नहीं, बल्कि करुणा, त्याग, संघर्ष और आत्मबलिदान की मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा होता है।
देवी रूप कुमारी की लेखनी की एक झलक देखें:
“जैसे ज़ैनब ने क़लम थामी हो उस रात की याद में,
लफ़्ज़ भी कांपते थे, अश्क़ भी शर्मिंदा थे।”
“हुसैन गिरा नहीं था बस झुका था सजदे में,
सच्चाई की आख़िरी नमाज़ पढ़ने को।”
“बसी हुई थी दर्द की तस्वीर हर इक चेहरों पे,
मगर ज़ैनब की आँखों में इंकलाब लिखा था।”
इन पंक्तियों से यह स्पष्ट होता है कि देवी रूप कुमारी के मर्सिए केवल करुणा नहीं, चेतना और प्रतिरोध का स्वर भी हैं। वे स्त्री दृष्टिकोण से इतिहास को देखने की एक सशक्त परंपरा का आरंभ करती हैं।
मर्सिया की आज की प्रासंगिकता
आज जब साहित्य के कई रूप धीरे-धीरे डिजिटल माध्यमों में सिमट रहे हैं, मर्सिया लेखन नई पीढ़ी के लिए भावनाओं और इतिहास को समझने का एक माध्यम बन सकता है। यह हमें याद दिलाता है कि करबला केवल एक घटना नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक है।
देवी रूप कुमारी जैसे साहित्यकार इस बात के उदाहरण हैं कि परंपरागत विधाओं में भी नवीनता लाई जा सकती है, और स्त्रियों की भूमिका केवल पाठक या श्रोता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए—वे सृजनकर्ता भी हैं।

परंपरा का संरक्षण: इदारा-ए-तहफ़्फ़ुज़-ए-मर्सियाख़्वानी
आज भी लखनऊ में मर्सिया परंपरा को जीवित रखने का कार्य कई संस्थाएँ कर रही हैं। ‘इदारा-ए-तहफ़्फ़ुज़-ए-मर्सियाख़्वानी’ द्वारा हर वर्ष 1 मोहर्रम से 9 मोहर्रम तक इमामबाड़ा नाज़िम साहब में मर्सिया ख़्वानी की मजलिसों का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन न केवल साहित्यिक परंपरा को बनाए रखने का प्रयास है, बल्कि लखनऊ की साझा सांस्कृतिक पहचान को भी जीवंत बनाए रखने का प्रतीक है।
इस मंच से पढ़े जाने वाले मर्सिये पुराने लखनऊ की तहज़ीब, भाषा और भावनाओं का दस्तावेज़ होते हैं, जिनमें कई हिंदू लेखकों की रचनाएँ भी शामिल होती हैं। यह आयोजन यह सिद्ध करता है कि मर्सिया केवल मज़हबी विधा नहीं, बल्कि साहित्यिक धरोहर भी है जिसे समुदाय की सीमाओं से परे देखा जाना चाहिए।
यह लेख भारतीय साहित्य में सांझी विरासत और साझा आस्थाओं को समर्पित है।

अली हसन
लेखक हिंदुस्तान नामा के संपादक हैं और मीडिया एवं पब्लिशिंग जगत में एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में व्यापक अनुभव रखते हैं।















