“हुसैन ज़िंदा है, हर दिल में, हर गली में, हर जात में — क्योंकि हुसैन सिर्फ नाम नहीं, एक पैग़ाम है।”
रिपोर्ट: अली हसन | हिंदुस्तान नामा, लखनऊ
लखनऊ, 3 जुलाई 2025 — मोहर्रम का महीना जब भी दस्तक देता है, लखनऊ की फ़िज़ा बदल जाती है। यह शहर, जो गंगा-जमुनी तहज़ीब की पहचान है, मातम, मोहब्बत और मुहब्बिराना एकता का प्रतीक बन जाता है। मोहर्रम की अज़ादारी यहाँ सिर्फ़ शिया समुदाय की धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है। हिंदू, सुन्नी, सिख और अन्य समुदायों की भागीदारी इसे एक सांप्रदायिक सौहार्द का जीवंत नमूना बनाती है।

इसी माह-ए-ग़म में जब 7वाँ मोहर्रम आता है, लखनऊ की गलियों में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक जुलूस — शाही मेहंदी निकलता है। यह जुलूस, जो हज़रत क़ासिम (अ.स.) की अधूरी शादी की रस्म का प्रतीक है, सिर्फ़ एक मातमी कार्यक्रम नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ है, जिसमें दर्द भी है, विरासत भी और वफ़ादारी का इज़हार भी।

शाही जरी जुलूस 7 मोहर्रम, लखनऊ, 3 जुलाई 2025
अज़ादारी की तहज़ीबी जड़ें
लखनऊ की अज़ादारी की नींव अवध के नवाबों, विशेषकर नवाब असफ-उद-दौला ने 18वीं सदी में रखी। उन्होंने इस शहर को शिया इस्लामी संस्कृति का गढ़ बनाया, जहाँ मजलिस, सोज़ख्वानी, नौहाख्वानी, और अलम-ताज़िए की परंपराएँ विकसित हुईं। यह अज़ादारी 29 जिल-हिज्जा से रबी-उल-अव्वल की 8 तारीख तक चलती है — दुनिया की सबसे लंबी मातमी परंपरा।
इस परंपरा में हुसैनी ब्राह्मणों की भागीदारी, हिंदुओं द्वारा इमामबाड़ों का निर्माण, और शहर भर में सबील लगाने की रस्में — लखनऊ की शिरकत भरी विरासत का परिचायक हैं।

7 मोहर्रम की पूर्व संध्या पर रोशनी से जगमगाता बड़ा इमामबाड़ा, लखनऊ, 3 जुलाई 2025
शाही मेहंदी: हज़रत क़ासिम की अधूरी शादी का प्रतीक
हज़रत क़ासिम (अ.स.), इमाम हसन (अ.स.) के पुत्र और इमाम हुसैन (अ.स.) के भतीजे, महज़ 13 वर्ष के थे जब करबला में शहीद हुए। करबला की ज़मीन पर उनका रिश्ता फातिमा कुबरा से होना तय था, मगर जंग ने वह ख़ुशी छीन ली। शाही मेहंदी जुलूस उसी अधूरी शादी की मेहंदी रस्म का प्रतीक बन गया, जिसे पहली बार नवाब मोहम्मद अली शाह ने 19वीं सदी में शुरू किया और वाजिद अली शाह ने इसमें शायरी और संगीत का रंग भर दिया।
यह जुलूस 1977 में प्रतिबंध के चलते दो दशक तक बड़ा इमामबाड़ा के भीतर सीमित रहा, लेकिन 1998 में फिर से सड़कों पर लौटा — पूरी रौनक और रूहानियत के साथ।

7 मोहर्रम लखनऊ, 3 जुलाई 2025
जुलूस का रंग, रूह और रास्ता
शाही मेहंदी जुलूस की शुरुआत बड़े इमामबाड़े से होती है और यह छोटे इमामबाड़े तक जाता है। मार्ग में हजारों अज़ादार शामिल होते हैं — काले कपड़ों में, नंगे पाँव, “या हुसैन” और “या क़ासिम” की सदा के साथ।
मुख्य विशेषताएं:
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मेहंदी की ज़रीह: दो प्रतिकृतियाँ, जिन पर सुन्नी कारीगरों की नक्काशी होती है।
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सजाए गए जानवर: हाथी, ऊँट और ज़ुल्जनाह की प्रतिमा — करबला के दृश्य की पुनर्रचना।
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अंजुमनें व अलम: मातम करती अंजुमनें, नौहे पढ़ते नौहाख्वान, और सोज़ख़्वान — हर मोड़ पर करबला की तहरीर दोहराते हैं।
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सबील: हर मज़हब के लोग मीठा पानी, शरबत, दूध का वितरण करते हैं — एकजुटता और सेवा का प्रतीक।
यह जुलूस केवल रिवायत नहीं, एक जीता-जागता इतिहास है जिसे हर साल लखनऊ दोहराता है।
सुरक्षा और प्रशासन
2025 के जुलूस को लेकर लखनऊ प्रशासन ने विशेष इंतज़ाम किए। ड्रोन निगरानी, CCTV, और ट्रैफिक डायवर्जन के माध्यम से हर क़दम पर नज़र रखी गई। 15 मुख्य मार्गों पर विशेष सुरक्षा बल तैनात रहे। डीसीपी मध्य क्षेत्र के अनुसार, “यह जुलूस लखनऊ की विरासत है, और उसकी सुरक्षा हम सबकी ज़िम्मेदारी है।”
सांस्कृतिक साझेदारी: लखनऊ का अनोखा पहलू
लखनऊ की अज़ादारी का सबसे खूबसूरत पहलू इसकी समावेशिता है। हिंदू भाइयों का सबील लगाना, सुन्नी अंजुमनों की भागीदारी, और अज़ादारों में हुसैनी ब्राह्मणों की उपस्थिति — यह दर्शाता है कि हुसैन (अ.स.) सिर्फ एक धर्म के नहीं, इंसानियत के प्रतीक हैं।

7 मोहर्रम की संध्या पर रोशन आसिफी मस्जिद, लखनऊ, 3 जुलाई 2025
चुनौतियाँ और जज़्बा
1908, 1968, 1977 — लखनऊ ने कई बार सांप्रदायिक तनाव देखे, लेकिन अज़ादारी की परंपरा कभी रुकी नहीं। कोविड महामारी के दौरान जब मजलिसें ऑनलाइन हुईं, तब भी लोगों ने दिल से मातम किया।
1998 की वापसी के बाद अब लखनऊ की अज़ादारी फिर से अपने पूर्ण स्वरूप में है — मजबूती से, गरिमा से और प्यार से।निष्कर्ष
7वाँ मोहर्रम का शाही मेहंदी जुलूस, लखनऊ की अज़ादारी की रूह है। यह सिर्फ़ मातम नहीं, एक ऐसा इज़हार है जिसमें करबला की कसक भी है और तहज़ीब की ताबीर भी। यह जुलूस हमें याद दिलाता है कि मज़हब चाहे जो हो, अगर मक़सद इंसाफ़, मानवता और ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज़ उठाना है, तो हर इंसान हुसैनी हो सकता है।
हिंदुस्तान नामा की ओर से, हम लखनऊ की इस विरासत को सलाम करते हैं — यह सिर्फ़ अज़ादारी नहीं, इंसानियत का जश्न है।















