अली हसन | हिंदुस्तान नामा
“शोला हूँ, चिंगारी हूँ, मैं जोश मलीहाबादी हूँ…”
यह वह सदा थी जिसने अंग्रेज़ी ताज को ललकारा, और ग़ुलामी की ज़ंजीरों को लहू से काटने की जुर्रत की। लेकिन आज वही सदा खामोश है, वही शोला बुझा हुआ-सा लगता है।
जोश मलीहाबादी — एक नाम, एक आवाज़, एक तहरीक। उनकी शायरी इंकलाब का एलान थी, और अज़ादारी उनकी रूह का हिस्सा। लेकिन अफ़सोस, उनका वुजूद अब सिर्फ़ किताबों और मुजमिल यादों में रह गया है। मलीहाबाद में उनका पुश्तैनी घर, जो इल्म, अदब और अकीदत का मरकज़ हुआ करता था — आज खंडहर बन चुका है।

🔸 जोश: शायर-ए-इंकलाब और अज़ादार-ए-वफ़ा
शब्बीर हसन ख़ाँ उर्फ़ जोश मलीहाबादी सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, वो एक तहज़ीब थे। उनका ताल्लुक़ अफ़रीदी पठान ख़ानदान से था, जिनका तअल्लुक़ अदब और सियासत दोनों से रहा। घर पर अरबी, फ़ारसी, उर्दू और अंग्रेज़ी की तालीम मिली, और बाद में उन्होंने टैगोर के शांतिनिकेतन और आगरा के सेंट पीटर कॉलेज से भी तालीम हासिल की।
जोश के वालिद बशीर अहमद ख़ाँ, दादा नवाब अहमद ख़ाँ और चचा अमीर अहमद ख़ाँ — सब के सब शायर थे। अदब उनके लहू में था और इंकलाब उनकी रगों में।

शहर सीतापुर में लगा हुआ जोश मलीहाबादी के शेर का एक बैनर
🔹 अज़ादारी: एहसास और इज़हार
जोश की शायरी में ग़म-ए-हुसैन का असर साफ़ झलकता है। उनका इमामबाड़ा, जो एक दौर में मजलिसों और मातम की आवाज़ों से गूंजता था, अब वीरान पड़ा है।
उनके चंद अशआर आज भी रूह को झिंझोड़ देते हैं:
“जिंदा रखा है हमें कर्बला ने वरना,
ज़िंदगी का हर मोड़ बस इम्तिहान निकला।”
“लहू से सींची है इस्लाम की ज़मीन मैंने,
हुसैन कह के जो रोया, वही यकीन मैंने।”
“ग़म-ए-हुसैन में बहती रही जो अश्कों की रवां,
उसी में डूबी हुई है जोश की सारा जहाँ।”
🔹 शायरी से सियासत तक: एक बेबाक क़लम
1925 में उन्होंने हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी में तर्जुमा विभाग की निगरानी शुरू की, लेकिन निज़ाम के ख़िलाफ़ नज़्म लिखने पर वहां से निकाल दिए गए। इसके बाद उन्होंने “कलीम” नामक रिसाला शुरू किया और आज़ादी के हक़ में क़लम उठाया।
उनकी नज़्म “हुसैन और इंकलाब” ने उन्हें शायर-ए-इंकलाब का दर्जा दिलाया। जवाहरलाल नेहरू से उनकी क़रीबी उन्हें सियासी अदब की मज़बूत आवाज़ बना देती है।
🔹 मलीहाबाद की वीरानी और तहज़ीब की तबाही
जब हिंदुस्तान नामा की टीम मलीहाबाद में जोश के घर पहुँची, तो मंज़र दर्दनाक था। टूटी दीवारें, जर्जर छतें, उखड़ी ईंटें और एक उदास इमामबाड़ा… उस घर की वीरानी मानो एक तहज़ीब का मातम कर रही थी।

जोश मलीहाबादी के नाम पर सड़क का गेट

जोश मलीहाबादी के घर के अंदर के हालात

जोश मलीहाबादी के घर के अंदर के हालात

जोश मलीहाबादी के सड़क पर का गेट

जोश मलीहाबादी के सड़क पर का गेट

वो घर जहां जोश मलीहाबादी का बचपन बीता
🔹 अब सवाल उठते हैं…
❓ क्या हम ऐसे अदबी और तहज़ीबी विरसे को यूँ ही नज़रअंदाज़ करते रहेंगे?
❓ क्या सरकार और तहज़ीब-दोस्त अफ़राद की ये ज़िम्मेदारी नहीं कि जोश मलीहाबादी जैसे शख्स के घर को एक सांस्कृतिक धरोहर में तब्दील करें?
जोश सिर्फ़ एक शायर नहीं, एक दौर थे। और उस दौर को मिटने देना बेइंसाफ़ी होगी।
क्योंकि…
“काम है मेरा तग़य्युर, नाम है मेरा शबाब
मेरा नारा: इंकलाब-ओ-इंकलाब-ओ-इंकलाब…”
-जोश मलीहाबादी
हिंदुस्तान नामा | तहज़ीब की आवाज़















