रितेश सिन्हा। चुनाव विशेष
भारी पड़ेगा सेना पर दिया गया बयान, आरक्षण के दायरे में लाने की मंशा जाहिर
बिहार चुनाव में टिकटों में मोल-भाव के साथ हुई बंदरबांट के बाद कांग्रेसी कार्यकर्ता व स्थानीय नेता हताश हैं। तमाम कोशिशों के बाद भी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की नाराजगी अब तक दूर नहीं की जा सकी। राष्ट्रीय पर्यवेक्षक बने अशोक गहलोत, अधीर रंजन चौधरी, भूपेश बघेल पांचसितारा होटलों में पैक होकर रह गए। वहीं अपने मियां-मिट्ठू बने बिहार में चुनाव संचालन और समन्वय बनाने पहुंचे अविनाश पांडे को कार्यकर्ताओं ने सिरे से नकार दिया। नेताओं और कार्यकर्ताओं की अनदेखी के बाद अविनाश पांडे ने मतदान के पूर्व प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं के साथ संपर्क साधा। मान-मनौव्वल के दौर में अपने राजनीतिक उस्ताद सुबोध कुमार को लेकर ऐसे नेताओं के घरों पर हाजिरी भी लगाई, पर इन वरिष्ठ नेताओं ने किसी न किसी बहाने चुनाव प्रचार के लिए अपनी असमर्थता जता दी।
प्रथम चरण का मतदान 6 नवंबर को हो रहा है। कांग्रेस ने देश भर के 40 से अधिक वरिष्ठ नेताओं को एक-एक विधानसभा क्षेत्र की जवाबदेही दी थी, मगर कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की भारी नाराजगी के बीच उन्होंने चुनाव से ही दूरी बना ली। यूपी के 400 से अधिक विधानसभा के सरदार बने अजय राय बिहार में 1 विधानसभा के प्रभारी बनकर 1 दिन के लिए आए और किसी तरह दिन बिताकर चल दिए। पूर्व प्रभारी भक्तचरण दास का भी 1 विधानसभा की जिम्मेदारी के साथ बिहार आने का कार्यक्रम था, मगर वे कहां हैं, इसकी सूचना अब तक प्रदेश कार्यालय को भी नहीं है। राहुल की ’वोट चोरी’ यात्रा के साथ जो उत्साह बना था, वो सीट चोरी के बाद ’सीट छोड़ गद्दी छोड़’ नारे में बदल गया। अब दिल्ली से आई टीम फाइव स्टार तक सीमित होकर रह गई।
बिहार में कांग्रेस के स्टार प्रचारक बने नेताओं में अखिलेश सिंह को छोड़कर और किसी का अता-पता नहीं है। पप्पू यादव और कन्हैया केवल अपने क्षेत्रों तक सीमित हैं। राजनीतिक अपरिपक्वता का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि बेगूसराय के बगल में हुई मोकामा में जातीय हिंसा में उनके प्रिय वोट बैंक अतिपिछड़ा की हत्या हो जाती है, पिछड़ा और अतिपिछड़ा की देश भर में राजनीति करने वाले राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे समेत वहां कोई बड़ा कांग्रेसी नेता वहां नहीं गया। आश्चर्य की बात देखिए कि इस दौरान मोकामा के बगल में बेगूसराय में राहुल गांधी को वीआईपी के साहनी, कांग्रेसी कन्हैया मछली पकड़ना सीखा रहे थे।
दलितों के यहां जाने वाले अल्पसंख्यकों की हत्या और नृशंस घटनाओं के बाद वहां भी आंसू पोछने राहुल नहीं गए, राहुल-खरगे समेत उनके समर्थक संविधान की प्रति सदन व सड़क पर लहराते जरूर नजर आते हैं तो क्या अल्पसंख्याक संविधान के दायरे में नहीं आते हैं। मामला यहीं नहीं रूकता है। बिहार में प्रचार के दौरान चुनावी सभा में कांग्रेसी सांसद राहुल गांधी के दिए गए बयान से सेना को आरक्षण के दायरे में लाने की बात उनकी मंशा को ही जताता है। राहुल के बयान पर गौर करेंं तो ’’देश की 90 फीसदी आबादी दलित, महादलित, पिछड़ी, अति पिछड़ी या अल्पसंख्यक समुदायों से है। 500 सबसे बड़ी कंपनियों की सूची निकालें तो आपको पिछड़े या दलित समुदायों का कोई भी व्यक्ति वहां नहीं मिलेगा। वे सभी शीर्ष 10 फीसदी से आते हैं। सभी नौकरियां उन्हीं के पास जाती हैं। सेना पर उन्हीं 10 फीसदी लोगों का कंट्रोल है। आपको शेष 90 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व कहीं नहीं मिलेगा।“
आपको बता दें कि सेना में मेरिट, साहस, समर्पण और तकनीकी दक्षता की योग्यता उनके पद, पदोन्नति के लिए जरूरी है। कड़े प्रतिस्पर्धा के बाद उनका चयन होता है। इससे सेना की गुणवत्ता बनती है। जनरल से पहले फील्ड मार्शल बने सैम मानेकशॉ इसके बड़े उदाहरण हैं जिनके नेतृत्व में देश ने अपने दुश्मन मुल्क के दो टुकड़े ही नहीं किए, बल्कि 93000 सैनिकों का आत्मसमर्पण भी करवाया। ले‐ कमांडर जेएस अरोड़ा और मेजर जनरल जैकब ये किसी आरक्षण के बूते सेना में नहीं आए और इनको मिली पदोन्नति इनके साहस और समर्पण का नायाब उदाहरण है। इनको अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सैन्य स्कूलों में विशेष रूप से पढ़ाया जाता है।
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से ठीक पहले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष व पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बयान ने पार्टी की निराशा ही जाहिर की। बिहार में चुनाव के मौके पर हरियाणा की हार की बात कर ये स्वीकार कर लिया कि जैसा वहां हुआ, वैसा यहां भी होगा। हरियाणा में भी बिहार की तरह टिकटों का बड़ा खेल हुआ था और जीती हुई बाजी कांग्रेस हार गई थी। माकन वहां भी स्क्रीनिंग के चेयरमैन थे। माकन को इसके बदले इनाम ही मिला। राहुल ने हरियाणा चुनाव में ’25 लाख वोट चोरी’ का आरोप लगाकर कांग्रेस की हार को पहले से ही स्वीकार कर लिया है। बिहार में पिछले 35 सालों से गैर-कांग्रेसी सरकारों से आम जन ऊब गया है। यही वजह थी कि राहुल की यात्रा के दौरान वहां का मतदाता मुखर हुआ और उनके पदयात्रा में शामिल हुआ।
बिहार के नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी उम्मीद थी कि वो अकेले सूबे में चुनाव लड़ेगी, लेकिन चुनाव आते-आते प्रभारी अल्लावरू समेत कांग्रेस अध्यक्ष के घर से लालू के साथ साठगांठ बढ़ गई। एक बड़े खेल के साथ कांग्रेस ने न केवल कम सीटों पर समझौता स्वीकार किया, बल्कि खांटी कांग्रेसियों के टिकट के दावे को दरकिनार करते हुए कई खेल खेले। इससे प्रदेश के नेता जहां घर बैठ गए, वहीं स्थानीय कार्यकर्ता कांग्रेसी डंडे से झंडा उतारकर महागठबंधन के उम्मीदवार को हराने के लिए जुट गए। राहुल के इर्द-गिर्द कांग्रेसी चुनाव के प्रचार से हटाकर मछली पकड़ने, जलेबी छानने के खेल में उलझाकर हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ने का ताना-बाना बुनने में जुट गए।
राहुल की गुरूनानक जयंती के अवसर पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस हार की हताशा का जीता-जागता सबूत है। इसके पीछे की कहानी हाल में बिहार में किए गए चाणक्या, पोलस्ट्रैट और आईएएनएस के द्वारा किए गए सर्वे हैं, जिसमें एनडीए की भारी बढ़त दिख रही है। वहीं सर्वे में जनसुराज और ओवैसी की पार्टी महागठबंधन के अल्पसंख्यक और सेकुलर वोटों पर अच्छी-खासी सेंधमारी करता दिख रही है। ऐसे में खरगे के रणनीतिकार राहुल गांधी को आगे कर ‘वोट चोरी’ वाला बयान जारी करवा कर नतीजों से पहले ही खुद को बचाने की एक सियासी कोशिश भर है। देखना है कि पहले चरण के मतदान के बाद महागठबंधन की क्या तस्वीर निकल कर आती है, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें टिकी हुई है।















