रितेश सिन्हा |
नेता विपक्ष व पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी को सदन से लेकर सड़क तक धार देने में जुटे हैं। इस एजेंडे में अकेले वे पूरे विपक्ष पर भारी हैं, लेकिन कांग्रेस संगठन में वर्षों से जमें-जमाए लोग ही उनकी धार को कुंद करने में जुटे हैं। कांग्रेस का अग्रिम संगठन सेवा दल, जो एक जमाने में चुनावी बूथ प्रबंधन के लिए मशहूर था, महेंद्र जोशी के कार्यकाल में कमरों में सिमट कर रह गया। कांग्रेस सेवा दल का कार्यक्रम केवल जन्मदिन मनाना भर है। वर्तमान में इसे गुजरात के एक छोटे एनजीओ के मालिक लालजी देसाई चला रहे हैं। सेवा दल अब एक बोर्ड पर टिका है और कांग्रेस का कोढ़ बन चुका है। कभी इस संगठन को इंदिरा गांधी खुद देखती थीं, उनके बाद राजीव गांधी इसके अध्यक्ष बने। तारिक अनवर, रामेश्वर निखरा ने भी संगठन को धार दी। प्रहलाद यादव ने इसे गति दी, पर महेंद्र जोशी ने इसे समेट दिया। संगठन के गौरव को लौटाने के लिए पूर्व सांसद दादा डीपी राय की संस्तुति होती रही है। डीपी राय एक जमाने में युवा विकास केंद्र के कर्ता-धर्ता थे, देश भर के उनके कार्डिनेटरों ने ब्लॉक तक संगठन को फैलाया। उन कार्डिनेटरों में अपनी संगठन क्षमता से राज्यों की विधानसभाओं में उपस्थिति दर्ज करायी। वर्तमान में अमेठी के सांसद किशोरी लाल शर्मा भी उन्हीं के स्कूल के छात्र रहे हैं।
कांग्रेस का एक और अग्रिम संगठन अखिल भारतीय महिला कांग्रेस बदहाली के आंसू बहा रहा है। महिला कांग्रेस अध्यक्षा अलका लांबा इसे बकायदा दुकान बना दिया। वे एनजीओ के जरिए राहुल गांधी की फोटो के साथ सैनेटरी नैपकीन बड़ी शान से बेच रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों में महिला कांग्रेस में पद पाना और पद पर बने रहने के लिए ’एक टार्गेट के साथ सैनेटरी पैड’ बेचना अब जरूरी है। अखिल भारतीय महिला कांग्रेस को इंदिरा से लेकर कांग्रेस के दिग्गज महिला नेत्रियों ने सींचा है। इनमें पहली महिला कांग्रेस अध्यक्षा बेगम आबिदा अहमद, कुमुद बेन जोशी, गिरिजा व्यास अंबिका सोनी, चंद्रेश कुमारी, मार्गेट आल्वा, नीटा डिसूजा तक संगठन काफी कारगर रहा। अलका लांबा ने इसे अपनी सनक और हनक के साथ महिला कांग्रेस की कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को सैनेटरी पैड का धंधा करने वाली महिला बना दिया है।
कांग्रेस का यूथ विंग एनएसयूआई अब कन्हैया कुमार की हाथ का खिलौना है, जिसका वे अपनी सुविधानुसार कहीं भी सौदा कर लेते हैं। एनएसयूआई का बैनर और अपने हाथ में लिए तिरंगा लाल झंडा झुका देते हैं। जिस जेएनयू के बूते अपने नेतृत्व का कांग्रेस में लोहा मनवा रहे हैं, वहां अब जाने से भी कतराते हैं। बड़बोले कन्हैया खुद को गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले परिवार का होनहार बताने वाले किसी दिग्गज बड़े रसूखदार कांग्रेसी से धन-बल के साथ टकरा सकते हैं। कांग्रेस हाईकमान को टीवी डिबेट में अपने बड़बोलेपन से उलझाकर किसी भी राजनीतिक दल से कभी भी समझौता कर सकते हैं। लाल झंडे से आज भी उनका लगाव है। यही वजह है कि एनएसयूआई के इंचार्ज होते हुए छात्र संगठन चुनावों से दूरी बनाते हुए लापता रहे हैं।
कन्हैया चारों तरफ से पिट-पिटाकर कांग्रेस में घूसे और बिहार से पिटे, दिल्ली में अपनी हनक दिखा रहे हैं। अब बिहार विधानसभा में घूसने की कोशिशों में राजद के जेएनयू वाले राज्यसभा सांसद मनोज झा के सहारे तेजस्वी को लुभाने में लगे हैं। लिखाई-पढ़ाई में नौवीं फेल की डिग्री लिए तेजस्वी बिहार राजनीति में वो अब पीएचडी हैं। कन्हैया और पप्पू यादव को जिस तरह से राहुल की उपस्थिति में धकिया कर गाड़ी से ठेल दिया, वह कांग्रेस में ऐसे लोगों के प्रति नापसंदगी का इजहार है। वहीं अखिलेश सिंह एक जमाने से लालू के वफादार और दफादार उसी गाड़ी पर सवार थे। कांग्रेसी बनकर जब पहली बार कन्हैया सदाकत आश्रम पहुंचे थे, तो एयरपोर्ट से मुख्यमंत्री कैसा हो कन्हैया जैसा हो जैसा स्लोगन गूंज रहा था। अब किसी तरह तेजस्वी की गाड़ी में लटकन बनने को तैयार बैठे हैं। राहुल और प्रियंका के दरबार में ऐसे लोगों की भरमार है जिन्होंने एनजीओ का खेल दिखाकर कांग्रेस संगठन मलाईदार पदों को कब्जा लिया है। इन नेताओं ने ही यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, गुजरात और हरियाणा के चुनावों में कांग्रेस का कबाड़ा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।
दलित राजनीति के सहारे कांग्रेस अध्यक्ष की कमान संभालने वाले मल्लिकार्जुन खड़गे तो लोकसभा की चुनाव लड़ने की हैसियत तक खो बैठे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष अपना हाईकमान किसी और को बताते हैं। उनकी एक मात्र इच्छा अभी भी कर्नाटक का सीएम बनना है जिसे अपनी कोशिशों से अमलीजामा पहनाने में जुटे हैं। खांटी कांग्रेसी का बिल्ला लटकाए खड़गे को पार्टी की कमान दी थी, लेकिन बतौर अध्यक्ष वे कर्नाटक में भी फेल रहे थे। खड़गे और वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बीच बकायदा वोटिंग करायी गई थी, लेकिन विधायकों की संख्या बल तक वे जुटा नहीं सके थे। मुख्यमंत्री न बन सकने की खीज उन्होंने वी जॉर्ज पर डाल दी थी। वी जॉर्ज ने वोटिंग के जरिए मुख्यमंत्री तय करने की बात की थी क्योंकि बार-बार खड़गे तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के सामने विधायकों का साथ होने का दावा करते रहे। विधायक दल की बैठक में यह दावा भी झूठा साबित हुआ था। ताजा मामला कांग्रेस का एससी विभाग में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का है। यहां वरिष्ठ दलित नेताओं को दरकिनार करते हुए हाल में ही कांग्रेस में घूसे आम आदमी के सिपाही राजेंद्र पाल सिंह गौतम को कमांडर बना दिया।
एक दौर में यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी वी जॉर्ज को एके एंटोनी के बदले कांग्रेस वर्किंग कमिटी का सदस्य नामित करने और उनको संगठन प्रभारी बनाने के पक्ष में थी। खड़गे और जॉर्ज विरोधी दिग्विजय सिंह और राहुल-प्रियंका गांधी के यहां जमे जेएनयू से निकले जॉनी-टॉनी गैंग ने उनकी एंट्री बैन करा दी। खड़गे के यहां से पद प्राप्त करना कोई मुश्किल काम नहीं है। ऐसा कुछ हालिया नियुक्तियों से आभास होता है। बुलंदशहर में लोकसभा में कैंडिडेट के पैसों का बंदरबांट करने वाले नेताओं को बड़े पदों पर नवाजा गया है। फिलहाल हुई दलित और अनुसूचित जाति सेल में हुई नियुक्तियां अपने आप में ’दो और लो’ का बड़ा ज्वलंत उदाहरण है। वर्तमान में किसान कांग्रेस भी खड़ाऊं लेकर चल रही है। मजेदार बात है कि किसान कांग्रेस को बिल्डर चला रहे हैं।
आपको बता दें कि किसान कांग्रेस के अध्यक्ष सुखपाल सिंह खैरा के खड़ाऊं को लेकर संगठन चला रहे अखिलेश शुक्ला यूं तो पूर्वांचल से ताल्लुक रखते हैं लेकिन बेंगुलुरू में पहले प्रोपर्टी डीलर फिर बाद में बिल्डर बनकर किसान कांग्रेस की इमारत मजबूत कर रहे हैं। खड़गे के होते हुए उनकी बुलंदी एआईसीसी में सब पर भारी है। नियुक्तियों में दो और लो के खेल से लगभग 1000 से अधिक खेती-किसानी करने वाले किसान को छोड़कर बाकी सब पदाधिकारी, बिल्डर्स, व्यापारी, कारोबारी, धंधेबाज लोगों को किसान कांग्रेस के रास्ते कांग्रेसी बनाया जा रहा है। ताजा मामला बिहार में बने किसान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष का है जिसका खासा विरोध हो रहा है। विरोध करने वाले राष्ट्रीय पदाधिकारी भी किसान कांग्रेस के हैं।
चूंकि बिहार के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू भी कर्नाटक के हैं, लिहाजा शुक्ला भैया का दबदबा कायम है। खास बात है कि जहां कांग्रेसी सरकारें हैं, वहां कीमत कुछ ज्यादा है और बनने वालों की मारामारी बहुत है। कर्नाटकी पृष्ठभूमि और बेंगुलुरू से जुड़ाव होने के कारण किसी की अंगुली उठाने की हिम्मत नहीं है। अल्लावरू से शिकायत की गई जिसका खामियाजा संगठन से निष्कासन के रूप में आया। कांग्रेस में खड़गे की कार्यशैली पर सवाल हमेशा से उठते रहे हैं। नकारा कार्यशैली और निकम्मेपन के लिए बिहार से हटाए गए प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश और उनकी टीम अब सीडब्लूसी का हिस्सा हैं। प्रभारी अल्लावरू बिहार पहुंचते ही अलबला रहे थे, लेकिन ऐसी कौन सी ताकत लगी कि ठंडा गए। गुजरात के चुनावी नतीजों ने कांग्रेस संगठन की पोल खोल कर रख दी। बिहार में भी जल्द ही कांग्रेस को नकारात्मक परिणाम मिलेंगे, ऐसे संकेत स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।

रितेश सिन्हा
लेखक दिल्ली स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इस आलेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी विचार हैं ।















