“या हुसैन!” की सदा और “इंकलाब ज़िंदाबाद!” का नारा —
यह दोनों आवाज़ें भले अलग लगें, लेकिन इनके दिल में एक ही जज़्बा है: ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना और इंसाफ़ की मांग करना।
हिंदुस्तान में अज़ादारी (शोक और प्रतिरोध की परंपरा) और आज़ादी (स्वतंत्रता का आंदोलन), दोनों ही ऐसे सांस्कृतिक और राजनीतिक सिलसिले हैं, जिन्होंने न सिर्फ़ भारतीय समाज की रूह को झिंझोड़ा, बल्कि उसे गढ़ा भी।
अज़ादारी: मातम नहीं, मक़सद है
अज़ादारी महज़ मज़हबी रस्म नहीं है। यह एक विचार है — यज़ीदी ताक़तों के ख़िलाफ़ हुसैनी तहरीक का पैग़ाम। कर्बला में इमाम हुसैन ने जब जुल्म के सामने सिर झुकाने से इनकार कर दिया, तब उन्होंने आने वाली नस्लों को यह सबक दिया कि सच्चाई की राह में जान भी क़ुर्बान करनी पड़े, तो पीछे नहीं हटना चाहिए।
हिंदुस्तान में अज़ादारी की जड़ें बहुत गहरी हैं। लखनऊ, हैदराबाद, कश्मीर, मुर्शिदाबाद, चेन्नई, इलाहाबाद, पटना — हर जगह अज़ादारी ने एक सांस्कृतिक विरासत को जन्म दिया, जिसमें ताज़ियादारी, नौहा, मर्सिया, और मातमी जुलूस शामिल हैं।
मगर यह सिर्फ़ मज़हबी रस्म नहीं, एक राजनैतिक इज़हार भी रहा है।
जब कर्बला बन गया था क़ौमी चेतना का हिस्सा
1857 की पहली जंगे आज़ादी के दस्तावेज़ उठाएं तो पाएँगे कि कई शायर, आलिम, और अज़ादार, ब्रिटिश राज के खिलाफ़ हुसैनी मिसाल को लेकर उठे थे। लखनऊ में तो कई इमामबाड़ों में क्रांतिकारियों ने पनाह ली थी।
जोश मलीहाबादी, अली सरदार जाफ़री, कैफ़ी आज़मी, मोहसिन काकोरवी — इन तमाम शायरों ने अज़ादारी और इंकलाब, दोनों को एक ही तहज़ीब में पिरोया।
“सर देना अगर है तो हुसैन से सीखो,
ज़ुल्म के आगे झुकना नहीं है, ये तहज़ीब है हमारी।”
हिंदुस्तान की आज़ादी: जहां हर मज़हब ने दिया कंधा
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अगर गहराई से देखें, तो यह महज़ एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, यह एक सांझी रूहानी और सामाजिक बगावत थी।
मौलाना आज़ाद, हसरत मोहानी, अबुल कलाम, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान — इन तमाम क्रांतिकारियों ने इस्लाम और इंसानियत, दोनों के उसूलों को साथ लेकर अंग्रेज़ी हुकूमत को ललकारा।
हसरत मोहानी, जिन्होंने “इंकलाब ज़िंदाबाद” का नारा दिया, वो एक इमाम हुसैन के शैदाई थे।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान, जिन्हें अंग्रेज़ों ने फांसी दी, वो रोज़े और नमाज़ के साथ-साथ, मातम में भी शरीक रहते थे।
अज़ादारी और आज़ादी: साझा संघर्ष की ज़मीन
अगर अज़ादारी, ज़ुल्म के ख़िलाफ़ इज़हार है, तो आज़ादी का आंदोलन भी इंसाफ़ और बराबरी की लड़ाई थी।
हिंदुस्तानी मुसलमानों ने जब अज़ादारी की परंपराओं को निभाया, तो साथ में यह पैग़ाम भी दिया कि:
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हम हुसैनी हैं, यानी ज़ालिम का साथ नहीं देंगे
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हम हिन्दुस्तानी हैं, यानी मज़हब से ऊपर वतन की बात करेंगे
आधुनिक हिंदुस्तान में अज़ादारी और उसके मायने
आज का भारत एक लोकतांत्रिक, बहुलवादी और धर्मनिरपेक्ष देश है। अज़ादारी अब सिर्फ़ मुसलमानों की चीज़ नहीं रही।
लखनऊ की ‘रथयात्रा’ की तरह, मुहर्रम के ‘ताज़िए’ को भी हिंदू भाइयों की बराबर की हिस्सेदारी मिलती है।
अज़ादारी के मर्सियों में आज के ज़माने के सवाल भी शामिल हो रहे हैं:
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ग़रीबी, बेइंसाफ़ी, जातिवाद, और सांप्रदायिकता के खिलाफ़
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बच्चों की तालीम, औरतों की बराबरी, और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए
“हर ज़माने का यज़ीद नया होता है,
हर दौर में हुसैन होना पड़ता है।”
निष्कर्ष: एक कर्बला, दो तहरीकें
कर्बला एक तारीख़ी हादसा है, लेकिन उसकी रूह हमेशा जिंदा रहती है। और हिंदुस्तान की आज़ादी भी एक सदियों की तहरीक थी, जो अभी तक मुकम्मल नहीं हुई।
जब तक इस मुल्क में नाइंसाफ़ी है, तब तक अज़ादारी सिर्फ़ एक मज़हबी रस्म नहीं, एक सियासी और सामाजिक चेतना बनी रहेगी।
और जब तक इस चेतना में हुसैनी जज़्बा रहेगा, तब तक हिंदुस्तान की आज़ादी भी महफ़ूज़ रहेगी।

शाहिद ऐजाज़
शाहिद ऐजाज़ समकालीन इस्लामी चिंतन के एक उभरते हुए लेखक हैं, जिनकी लेखनी में रूहानी गहराई और समाजी बोध दोनों की झलक मिलती है। उनकी तहरीरें न सिर्फ दीनी मसाइल की वज़ाहत करती हैं, बल्कि आज़ादी, इंसाफ़ और इंसानियत जैसे बुनियादी उसूलों पर भी रौशनी डालती हैं। इस लेख के लेखक एक इस्लामी स्कॉलर हैं, जिनका मक़सद इल्म को आम करना और नयी नस्ल को अपने माज़ी से जोड़ना है।















