छऊ नृत्य शैली में जीवंत हुआ राजर्षि विश्वामित्र का रूपांतरण
नई दिल्ली। त्रिवेणी कला संगम के एम्फीथिएटर में नृत्य-नाट्य ‘विश्वामित्र’ का भव्य मंचन हुआ। छऊ नृत्य शैली पर आधारित इस अनूठी प्रस्तुति ने दर्शकों को भारतीय अध्यात्म, नृत्य, संगीत और नाट्यकला के अद्भुत संगम से परिचित कराया।
नृत्य-नाट्य ‘विश्वामित्र’ में राजा विश्वरथ के राजसत्ता से ब्रह्मर्षि विश्वामित्र बनने की गाथा को अत्यंत मार्मिक और प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया। कथा के प्रमुख प्रसंग— वशिष्ठ और विश्वरथ का संवाद, नंदिनी गाय की घटना, इंद्र द्वारा मेनका का प्रेषण, और तप से पूर्ण आत्मपरिवर्तन— ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। मंच पर अध्यात्म, संघर्ष और ज्ञान का सम्मिलन इस नृत्य-नाट्य की विशेषता रहा।

गुरु सापन आचार्य की प्रभावशाली कोरियोग्राफी और कुलदीप वशिष्ठ की संवेदनशील पटकथा ने छऊ नृत्य की पारंपरिक लयात्मकता को आधुनिक दृष्टि से संयोजित किया। नर्तकों का अद्भुत शारीरिक नियंत्रण, सजीव रंग-संयोजन, और संगीत की लाइव प्रस्तुति ने दृश्य-श्रव्य सामंजस्य को नई ऊँचाइयाँ दीं। प्रस्तुति की समाप्ति पर पूरा एम्फीथिएटर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

‘विश्वामित्र’ केवल एक नाट्यकृति नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन की उस आंतरिक यात्रा का प्रतीक था, जो दर्शकों को भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करता है। छऊ नृत्य की तीव्र गतियों में शक्ति और तप का संतुलन तथा संगीत में साधना की गूंज ने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम का आयोजन त्रिवेणी कला संगम के तत्वावधान में किया गया। समापन पर कला प्रेमियों, विद्यार्थियों और वरिष्ठ कलाकारों ने गुरु सापन आचार्य और उनकी टीम को इस उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई दी।
‘विश्वामित्र’ ने यह सिद्ध किया कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य केवल कथा कहने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन, तप और आत्मज्ञान की अनुभूति कराने वाली एक जीवंत साधना है।















