लखनऊ, 3 नवम्बर 2025 — इंटीग्रल यूनिवर्सिटी, कुर्सी रोड, लखनऊ का एम्फीथिएटर शनिवार की शाम कला, संवेदना और सामाजिक संदेशों का गवाह बना, जब ‘हेरिटेज ऑफ़ अवध ट्रस्ट’ के बैनर तले नाटक ‘दरवाज़े खोल दा’ का मंचन हुआ। यह नाट्य प्रस्तुति केवल एक रंगमंचीय प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि भारतीय समाज में व्याप्त संकीर्णताओं, पूर्वाग्रहों और भेदभाव के विरुद्ध उठाई गई एक गूंजती हुई पुकार थी — “खोलो अपने घरों के दरवाज़े, ताकि इंसानियत अंदर आ सके।”
नाटक की पृष्ठभूमि: मकान की तलाश से शुरू होकर इंसानियत की खोज तक
देश में रोज़गार और रोटी की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर जाने वालों की संख्या करोड़ों में है। परंतु, इन यात्रियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है — एक ऐसा घर जहाँ सिर छिपाया जा सके, पर किसी पहचान के बोझ के बिना।
इसी संवेदनशील विषय को केंद्र में रखकर तैयार किया गया नाटक ‘दरवाज़े खोल दा’ समाज की मानसिकता पर तीखा लेकिन मानवीय प्रहार करता है।
कहानी का केंद्रीय पात्र पंडित रामदयाल (अभिनय: गुरुदत्त पांडे) है — जो कई मकानों का मालिक होते हुए भी दिल का मकान बंद कर चुका है। वह किरायेदारों का इंटरव्यू लेता है, परंतु हर बार किसी न किसी सामाजिक या धार्मिक कारण से उन्हें ठुकरा देता है। उसकी सोच, समाज के उस हिस्से की प्रतीक है जो धर्म, जाति, भाषा और खान-पान के आधार पर लोगों को परखता है।
किरायेदारों की परत-दर-परत कहानी
पहले किरायेदार के रूप में कृपा राम भारद्वाज और सावित्री देवी (सौरभ शुक्ला व विनीता सिंह) आते हैं। जब उनकी असलियत खुलती है कि वे मुसलमान हैं, तो रामदयाल उन्हें भगा देता है।
दूसरे किरायेदार मुन्नन (रोहित श्रीवास्तव) हैं — कायस्थ परिवार से, परंतु उर्दू बोलने और मांसाहार के कारण उन्हें भी मकान नहीं मिलता।
तीसरे किरायेदार आफताब रॉय (सौरभ शुक्ला) हैं — ‘हिन्दू पठान’ जो धर्म से हिन्दू लेकिन जीवनशैली में मुस्लिम संस्कृति के निकट हैं। पंडित रामदयाल इन्हें भी अस्वीकार कर देता है।
फिर आता है वेल्लू (जावेद अहमद) — दक्षिण भारत से आया एक सम्पन्न व्यक्ति, जिसे केवल उसकी दलित पहचान के कारण घर नहीं मिलता।
अंत में डॉ. एडवर्ड कोएलू (न्यायमूर्ति बी.डी. नक़वी) और उनकी बेटी इज़ाबेला (अनामिका सिंह) आते हैं — एक ईसाई परिवार, जिन्हें पंडित रामदयाल “अंग्रेज़” कहकर टाल देता है।
लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर होता है। रामदयाल को अचानक दिल का दौरा पड़ता है और वही डॉ. कोएलू, जिन्हें अभी-अभी उसने अपमानित किया था, उसकी जान बचाते हैं। यह घटना नाटक का निर्णायक क्षण बन जाती है।
परिवर्तन की वह रोशनी
होश में आने के बाद रामदयाल कहता है —
“मुझे रास्ते में मेरी आत्मा मिली। उसने कहा — यह रास्ता अब कहीं नहीं जाता। आगे वही जा सकते हैं जो अपने घर के दरवाज़े खुले रखते हैं। यह घर हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी और यहूदी सबका है। अगर सब मिलकर नहीं रहेंगे, तो यह घर कभी आबाद नहीं होगा।”
यह संवाद न केवल नाटक का सारतत्व है, बल्कि वर्तमान समाज के लिए एक आईना भी। यह बताता है कि साझी संस्कृति ही इस देश की असली पहचान है, और जब तक दिलों के दरवाज़े बंद हैं, तब तक तरक्की के रास्ते भी बंद रहेंगे।
निर्देशन और प्रस्तुति का स्तर
नाटक का निर्देशन न्यायमूर्ति बी.डी. नक़वी (सेवानिवृत्त जज) ने किया, जिन्होंने न केवल संवेदनशील दृष्टि से कहानी को गढ़ा बल्कि मंच पर हर दृश्य को गहरी सामाजिक प्रासंगिकता दी। रियाज़ अल्वी, जावेद अहमद और विनीता सिंह ने सहायक निर्देशक के रूप में उत्कृष्ट कार्य किया।
रहमान खान ने कार्यशाला निदेशक की भूमिका निभाई, जबकि मुजतबा खान ने निर्माता के रूप में पूरे आयोजन को सफल बनाया। संगीत निर्देशन धीरेन्द्र का था, जिन्होंने पृष्ठभूमि में लखनऊ की तहज़ीब और मानवीय भावनाओं को एक साथ जोड़ा।
मंच सज्जा शकील अहमद की थी — साधारण लेकिन प्रभावशाली, जो हर दृश्य में समय और समाज की पृष्ठभूमि को उकेरती रही। मेकअप कलाकार सोनी और स्टेज इंचार्ज तारिक खान ने भी प्रस्तुति को सहजता और यथार्थ से जोड़ा।
कलाकारों का सशक्त अभिनय
गुरुदत्त पांडे ने रामदयाल के रूप में सामाजिक जड़ता और अंतर्मन के द्वंद्व को अत्यंत सजीवता से प्रस्तुत किया।
सौरभ शुक्ला, विनीता सिंह, रोहित श्रीवास्तव और जावेद अहमद ने अपने किरदारों में विविधता और यथार्थ का सुंदर मेल दिखाया।
न्यायमूर्ति बी.डी. नक़वी ने डॉ. कोएलू के रूप में अभिनय की एक नयी ऊँचाई छुई — उनकी उपस्थिति मंच पर नैतिक शक्ति जैसी महसूस हुई।
बाल कलाकार मायरा खान ने अपने छोटे लेकिन मार्मिक संवादों से दर्शकों के दिल जीत लिए।
संदेश जो मन में गूंजता रहा
नाटक का अंत तालियों की गड़गड़ाहट में हुआ, पर उसकी गूँज हर दर्शक के भीतर देर तक बनी रही। यह नाटक किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि एक आत्मालाप की तरह लगता है — जो पूछता है:
“क्या हम भी अपने दरवाज़े बंद रखे हुए हैं?”
‘दरवाज़े खोल दा’ एक ऐसी प्रस्तुति है जो मनोरंजन से आगे बढ़कर विचार को जन्म देती है। यह हमारे भीतर सोई उस इंसानियत को जगाने की कोशिश करती है जो धर्म, जाति और भाषा के खोल में कहीं दब गई है।
उपस्थित दर्शक और आयोजन का माहौल
इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों, छात्रों और शहर के गणमान्य नागरिकों ने बड़ी संख्या में उपस्थिति दर्ज की। पूरे कार्यक्रम का वातावरण कला, संवेदना और साझी विरासत की भावना से सराबोर था।
‘दरवाज़े खोल दा’ केवल एक नाटक नहीं, बल्कि समाज के लिए एक ज़रूरी दस्तक है। यह याद दिलाता है कि जब तक हम अपने घरों और दिलों के दरवाज़े नहीं खोलेंगे, तब तक हमारा समाज सच्चे अर्थों में “घर” नहीं बन पाएगा।















