रितेश सिन्हा ।
बिहार की राजनीति में अल्पसंख्यक समुदाय चुनाव के बाद राजद से अपमानित उपेछित बार-बार के आत्ममंथन के बाद भी सत्ता मे भाजपा को रोकने की चाह मे चुनाव मे भाजपा के खिलाफ राजद, कांग्रेस और ओवैशी को वोट कर देता है l राज्य का 17-18% मुस्लिम मतदाता
दशकों से लगातार एक शातिर सियासी घराना राजद की अगुवाई मे मुसलमानो के “वोट बैंक” की ठगी कर रहा है l “अपनापन” का नाटक कर खुद को धर्मनिरपेक्ष बताते हुए अल्पसंख्यक समाज के गंभीर मुद्दों को भी अब तक नजरअंदाज ही किया है। अल्पसंख्यक समाज के नौजवान अब विकल्प की तलाशते, नैतिक प्रश्नों और आत्मसम्मान की लड़ाई के लिए खुद को तैयार कर रहा है ।
भुलावे की राजनीति: वादों की बौउछार
, ज़मीनी हकीकत कुछ और चुनाव के पहले पटना की सड़कों, सीमांचल के गांवों और उत्तर बिहार की गलियों में “सर्वधर्म संवाद”, टोपी पहन karइफ्तार की रंगीन दावतें, घोषणओ के साथ अल्पसंख्यक समाज को टोपी पहनाने का वही पुराना खेल आज भी चालू है लेकिन जैसे ही चुनावी खत्म, वैसे ही अल्पसंख्यक तबका फिर से सहमा-सिकुड़ा अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। कांग्रेस और आरजेडी ने तो मुस्लिम वोटर को भाजपा के खौफ से अपने पाले मे टिकाये रखने का खेल बखूबी रखा राजद और कांग्रेस की सरकार पिछले 35 सालो से कभी कांग्रेस कभी नितीश के साथ सरकार बनती रही है लेकिन ना तो अल्पसंख्यक समाज को वज़ीब हक़दारी दी ना ही आज़ तक मुस्लिमो विधायकों मे किसी को उपमुख्यमंत्री बनाया यहीं वजह के जे पी आंदोलन से ही अल्पसंख्यक समुदाय से राजद के वरुश नेता को मुख्यमंत्री की बात छोड़िये उपमुख्यमंत्री के लायक नहीं समझा अनपढ़ बीवी को नौम्मा फ़ैल को उपमुख्यमंत्री बना कर अल्पसंख्यक समाज को औकात मे रखना अब भारी पड़ेगा लिए अब्दुलबारी सिद्दक़ी अपने बच्चों के दवाब के साथ अल्पसंख्यक सामाज के सम्मान के लिए पी के जनसुराज के साथ जुड़ गए l अल्पसंख्यक सीटों पे यादव को उम्मीदवार बनाने के खेल ने राजफ को बेनक़ाब कर दिया है — विधानसभा में 19 मुस्लिम विधायक, 2 करोड़ की आबादी, लेकिन नेतृत्व और प्रतिनिधित्व का नामोनिशान नहीं! ये आंकड़े किसी अफ़सोस, अपमान और लोकतांत्रिक धोखे से कम नहीं।
बिहार की तथाकथित सेक्युलर पार्टियां हमें याद दिलाती हैं कि जब सरकार बनानी हो, तो मुसलमानों के बिना सत्ता की कश्ती पार नहीं जाती। सीटों के बंटवारे में मुस्लिम समाज को “किंगमेकर” बताया जाता है—2015, 2019, 2020, 2024 के चुनावों में उनके पक्ष में भारी मतदान हुआ। किन्तु, जब टिकट बंटवारा होता है, तब “आंकड़ा” पीछे चला जाता है, परिवारवाद और जातिवाद आगे आ जाते हैं। पसमांदा तबका फिर हाशिए पर, अगड़ी जातियों को टिकट! क्या इसी का नाम जनतंत्र है?
मुस्लिम आबादी आज राजनीतिक, सामाजिक और जातीय स्तर पर विभाजित है—कहीं शेख, सैयद, पठान, कहीं पासमांदा, कहीं अशराफ और कहीं अजलाफ। कांग्रेस और आरजेडी ने कभी भी उस गहरे सामाजिक विभाजन को समझने और सुलझाने का साहस नहीं दिखाया; उलटा, वोटों की गिनती में इस समाज को केवल “कुल मुस्लिम वोट” बना डाला।
कांग्रेस और आरजेडी का सारा “मुस्लिम हितैषी” विमर्श चुनावी समय की शोशेबाज़ी से आगे नहीं जा पाया। घरों में चूल्हे ठंडे, रोजगार का संकट, स्कूलों की हालत जर्जर—लेकिन टिकट उन्हीं चंद चेहरों को जो पार्टी हाइकमान के दरबार में वफादार रहें। नए, योग्य, जमीनी मुसलमान नेताओं की कतार काट दी जाती है। कटघरे में मुसलमान खुद अपने मत पर सवाल उठाता दिखता है—”क्या मिला वोट देने से?”
पिछले कुछ सालों में AIMIM, जन सुराज पार्टी जैसे प्लेटफॉर्म्स ने अल्पसंख्यकों के गुस्से को सियासी आवाज़ दी है। सीमांचल में ओवैसी की उपस्थिति, प्रशांत किशोर की “आबादी के हिसाब से टिकट” की मांग—एक बड़ा संकेत है कि मुस्लिम समाज अब दिखावे, फूट डालो और शासन करो की राजनीति से आगे निकलना चाहता है। लेकिन, इन नई राहों में भी बड़ी पार्टियां इन्हें “वोट कटवा” बताने से नहीं चूकतीं—क्योंकि डर यह है कि नेतृत्व और भागीदारी की हकीकत सामने न आ जाए।
आरजेडी का सेक्युलरिज्म मरहम कम, समाज का मजाक ज्यादा बन गया है। सभाओं और भाषणों में अल्पसंख्यकों के ‘सुरक्षा’ की बातें होती हैं, लेकिन अल्पसंख्यक इलाकों का विकास, सरकारी भर्तियों में हिस्सेदारी, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की योजनाएं नदारद रहती हैं। सियासी गलियारों में मुसलमान केवल एक “संख्या” है, जिसकी उपयोगिता चुनाव बीतते ही खत्म हो जाती है।
सियासी गठबंधनों की अदला-बदली में मुस्लिम तबका हर बार नुकसान का शिकार हुआ। चाहे महागठबंधन हो या NDA, जेडीयू की पलटती चालें, या कांग्रेस की मौनगीरी—हर महफिल में उसे पास बुलाया गया, मगर रात गई, बात गई! नीतीश कुमार के अल्पसंख्यक संवाद, “कब्रिस्तान घेराबंदी” जैसी घोषणाएं अगर सच्चे होते, तो समाज की असल तस्वीर शायद अलग होती। मार्मिक है कि, 12% आबादी वाले कई क्षेत्रों में तो दर्जनों सालों से कोई मुस्लिम विधायक नहीं पहुंचा।
आज बिहार का मुसलमान खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। एक समय था, जब सत्ता की कुंजी उसकी एकजुटता मानी जाती थी, आज उसका वोट बिखर रहा है। नेता समझ रहे हैं कि अब वह सिर्फ दिखावे की बातों पर नहीं, परिणामों पर वोट देगा। नई राजनीतिक चेतना और नेतृत्व की मांग जगे, तभी राजनीतिक दलों को आख़िरकार समझ आएगी कि अब मुस्लिम समाज ‘सिर्फ वोट बैंक’ नहीं, अपने भाग्य का खुद निर्माता बनना चाहता है।
कांग्रेस और आरजेडी जैसे दलों का अल्पसंख्यकों के प्रति रवैया अब जनता की अदालत में कठघरे में है। सिर्फ चुनावी मौसम में ‘अपनापन’ की बात और बाकी समय में उपेक्षा—इसी का नाम राजनीति नहीं हो सकता। मुस्लिम समाज का असली नेतृत्व, वास्तविक भागीदारी, और जमीनी विकास का संघर्ष अभी लंबा है। समय की माँग है कि राजनीति के मंच पर मुस्लिम समाज सिर्फ ‘ठगा गया वोट बैंक’ नहीं, ठोस सवाल और नेतृत्व लेकर खड़ा हो—यही लोकतंत्र की असली बुनियाद है।

रितेश सिन्हा















