सरकार को पारदर्शी, न्यायसंगत और व्यावहारिक विकल्पों पर विचार करना चाहिएभारत में सड़क परिवहन के विकास हेतु टोल टैक्स प्रणाली वर्षों से लागू है। इसका उद्देश्य था कि उपयोगकर्ता से शुल्क लेकर राजमार्गों व एक्सप्रेसवे का निर्माण व रखरखाव सुनिश्चित किया जा सके। किंतु समय के साथ यह प्रणाली अनेक समस्याओं और असंतोष का कारण बनती जा रही है। आज जब तकनीक और आर्थिक संरचना नई ऊँचाइयों को छू रही हैं, तो यह आवश्यक हो गया है कि टोल टैक्स व्यवस्था की समीक्षा कर उसके विकल्पों पर गहराई से विचार किया जाए।
टोल टैक्स प्रणाली की प्रमुख कमियाँ
- दोहरे कराधान का बोझ: ईंधन पर लगने वाले भारी करों के बाद भी टोल टैक्स वसूलना नागरिकों पर दोहरा आर्थिक भार है।
- स्थानीय निवासियों के लिए अन्याय: टोल प्लाजा ऐसी जगहों पर बनाए गए हैं जहाँ स्थानीय लोग भी छोटे-छोटे सफर के लिए भुगतान करने को मजबूर हैं।
- वीआईपी-जनसामान्य में भेदभाव: कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को टोल से छूट जबकि आम जनता को नहीं – यह लोकतंत्र की आत्मा के विपरीत है।
- पारदर्शिता की कमी: निर्धारित समय से अधिक वर्षों तक टोल वसूली चलती है और जनता को कोई हिसाब नहीं दिया जाता।
- भ्रष्टाचार व अपारदर्शिता: टोल प्लाजा पर भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। नकद भुगतान और निजी ऑपरेटरों के नियंत्रण से राजस्व पर सवाल उठते हैं।
- यातायात में विलंब: फास्टैग के बावजूद टोल प्लाजा पर जाम लगना आम बात है, जिससे समय और ईंधन दोनों की बर्बादी होती है।
वैकल्पिक प्रणाली की आवश्यकता
अब वक्त आ गया है कि सरकार एक ऐसी व्यवस्था लागू करे जो समान, पारदर्शी और प्रभावी हो। ऐसी व्यवस्था जो करदाता के पैसे का समुचित उपयोग सुनिश्चित करे और हर नागरिक को बिना अतिरिक्त आर्थिक भार के सड़क उपयोग की स्वतंत्रता दे।
संभावित विकल्प
- ईंधन शुल्क आधारित मॉडल: पेट्रोल-डीज़ल पर तय सेस लगाकर पूरे देश से सड़क विकास हेतु राजस्व एकत्र किया जा सकता है।
- वन-टाइम वाहन कर: सभी निजी व व्यावसायिक वाहनों पर एकमुश्त कर लिया जाए जिसमें टोल का खर्च शामिल हो।
- GPS आधारित रोड यूसेज टैक्स: अत्याधुनिक GPS तकनीक द्वारा वाहन की दूरी और उपयोग के अनुसार डिजिटल बिल तैयार कर टैक्स वसूला जाए।
- पूर्ण सरकारी वित्त पोषण: सार्वजनिक निधियों द्वारा ही सड़कें बनाई जाएँ और निजी कंपनियों की आवश्यकता न हो।
- स्थानीय निकाय शुल्क प्रणाली: शहरों के भीतर आने वाली सड़कों का रखरखाव नगरपालिकाओं द्वारा नाममात्र शुल्क से किया जाए।
नीतिगत बदलाव की दिशा में सुझाव
- पारदर्शी मूल्यांकन प्रणाली
- सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का अध्ययन
- जन सहभागिता आधारित नीति निर्माण
- निजीकरण की सीमाओं की स्पष्ट परिभाषा
आज भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में टोल टैक्स प्रणाली एक असुविधा, असमानता और भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गई है। इसे तुरंत पारदर्शी, प्रभावशाली और दीर्घकालिक विकल्प से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए। एक राष्ट्र की सड़कों पर चलना उसका नागरिक अधिकार है, कोई लग्ज़री नहीं – और इसे शुल्क का भार नहीं बनाना चाहिए।

शिखर
लेखक उच्च न्यायालय, लखनऊ बेंच के अधिवक्ता हैं।लेखक ने अपने व्यक्तिगत अनुभव और ज्ञान के आधार पर इस लेख को लिखा है। इस लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने व्यक्तिगत विचार हैं ।















