लखनऊ / तेहरान:
जब भी ईरान की इस्लामी क्रांति का ज़िक्र होता है, दो नाम उभर कर सामने आते हैं – आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी और उनके उत्तराधिकारी आयतुल्लाह सैयद अली खामेनई। खुमैनी की क्रांति सिर्फ ईरान की राजनीति नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी जगत की सोच को प्रभावित करने वाली घटना थी। और कम ही लोग जानते हैं कि इस क्रांति की जड़ों में भारत की मिट्टी की भी खुशबू थी।

सैय्यद रूहोल्लाह मुस्तफवी, जिन्हें सैय्यद रूहोल्लाह मौसवी खुमैनी के नाम से भी जाना जाता है, के जन्म प्रमाणपत्र का पहला पृष्ठ
अवध से ईरान तक: एक आध्यात्मिक सफर
1902 में जन्मे सैयद रूहुल्लाह मूसावी खुमैनी के पिता, सैयद मुस्तफा मूसावी, मूलतः अवध से थे। वे एक प्रतिष्ठित आलिम थे, जो इस्लामी ज्ञान के प्रचार के लिए ईरान चले गए। खुमैनी के स्वभाव में जो सूफ़ियाना अंदाज़ और सामाजिक न्याय की बात दिखाई देती है, उसका स्रोत कहीं न कहीं लखनऊ की तहज़ीब और विचारधारा रही।
आयतुल्लाह खुमैनी ने न सिर्फ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को सराहा, बल्कि महात्मा गांधी को भी एक नैतिक और आत्मिक नेता के रूप में स्वीकार किया। गांधी के सत्याग्रह और शांति के रास्ते ने आयतुल्लाह खुमैनी की सोच को इस्लामी दृष्टिकोण से एक वैकल्पिक दिशा दी।

आयतुल्लाह अली खामेनेई की रूहुल्लाह खुमैनी की यात्रा – 13 अगस्त, 1986 (स्रोत: विकिमीडिया)
आयतुल्लाह खामेनई: क्रांति की मशाल आगे बढ़ाने वाला
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद जब खुमैनी ने अंतिम विदाई ली, तब उनकी विचारधारा और संघर्ष की विरासत को संभाला आयतुल्लाह सैयद अली खामेनई ने। आयतुल्लाह खामेनई आज भी ईरान के सर्वोच्च नेता हैं, और उन्होंने भी आयतुल्लाह खुमैनी की तरह भारत के साथ सांस्कृतिक और सभ्यतागत रिश्तों को हमेशा अहमियत दी है।
आयतुल्लाह खामेनई के भाषणों और लेखनी में अक्सर भारत की विविधता, आध्यात्मिकता, और उपनिवेशवाद के खिलाफ़ संघर्ष का ज़िक्र मिलता है। वे न सिर्फ आयतुल्लाह खुमैनी की विरासत को आगे बढ़ाते हैं, बल्कि आज की पीढ़ी को भी उस विचार से जोड़ने का प्रयास करते हैं जो अन्याय, साम्राज्यवाद और सांस्कृतिक दासता के खिलाफ है।
भारत-ईरान: रिश्तों की नई इबारत
आज जब दुनिया एक बार फिर वैचारिक विभाजन, युद्ध और आर्थिक असमानता के दौर से गुज़र रही है, तब आयतुल्लाह खुमैनी और आयतुल्लाह खामेनई जैसे नेताओं की सोच और भारत से उनके जुड़ाव को समझना बेहद ज़रूरी है। यह सिर्फ दो देशों के बीच संबंध नहीं, बल्कि दो महान सभ्यताओं की साझा चेतना है – एक ऐसी चेतना जो शांति, न्याय और आध्यात्मिकता पर आधारित है।
आयतुल्लाह खुमैनी की रगों में भारत का खून था, और आयतुल्लाह खामेनई की ज़ुबान में आज भी भारत के लिए इज़्ज़त है। ये रिश्ता महज़ इतिहास नहीं – एक जारी संवाद है, जो दिलों को जोड़ता है और इंसाफ़ की ज़ुबान बोलता है।
हिंदुस्तान नामा विशेष |अली हसन















